सात लाख पृथ्वीकाय, सात लाख अप्काय, सात लाख तेउकाय, सात लाख वायुकाय, दस लाख प्रत्येक वनस्पतिकाय, चौदह लाख साधारण वनस्पतिकाय, दो लाख बेइन्द्रिय, दो लाख तेइन्द्रिय, दो लाख चउरिन्द्रिय, चार लाख देवता, चार लाख नारकी, चार लाख तिर्यंच पंचेन्द्रिय, चौदह लाख मनुष्
आपके द्वारा लिखा गया पाठ जैन प्रतिक्रमण/आलोचना से जुड़ा हुआ भाव है, जिसमें साधक सभी प्रकार के जीवों के प्रति हुई हिंसा के लिए क्षमा-भाव प्रकट करता है।
यह वाक्य अंत में अधूरा रह गया है: “तो मन, वचन, काया करके अठारह लाख चौबीस…”
संभवतः यहाँ आगे पापस्थानक/दोषों की आलोचना-प्रतिक्रमण का भाव आता है, परंतु आपने पूरा पाठ नहीं दिया है। इसलिए मैं अधूरे अंश को अपनी ओर से पूरा नहीं करूँगा, क्योंकि पवित्र पाठों में अनुमान से शब्द जोड़ना उचित नहीं है।
अर्थ
इस भाव का सरल अर्थ है:
चलते-फिरते, उठते-बैठते, सोते-जागते, या किसी भी क्रिया में यदि मुझसे—
- पृथ्वीकाय जीवों,
- अप्काय यानी जलकाय जीवों,
- तेउकाय यानी अग्निकाय जीवों,
- वायुकाय जीवों,
- वनस्पतिकाय जीवों,
- बेइन्द्रिय, तेइन्द्रिय, चउरिन्द्रिय जीवों,
- देव, नारकी, तिर्यंच पंचेन्द्रिय और मनुष्य जीवों
में से किसी भी जीव की हिंसा हुई हो, हिंसा कराई हो, या हिंसा करने वाले की अनुमोदना की हो; किसी जीव को छेदा, भेदा, पीड़ा दी हो, तो मैं मन, वचन और काया से उसकी आलोचना/प्रतिक्रमण करता हूँ।
स्पiritual Understanding
जैन धर्म में यह भाव अत्यंत महत्वपूर्ण है, क्योंकि:
- सभी जीवों में आत्मा है।
- सूक्ष्म से सूक्ष्म जीव भी जीना चाहता है।
- अहिंसा केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि मन-वचन-काया की शुद्धि है।
- प्रतिक्रमण का उद्देश्य अपने दोषों को स्वीकार करके आत्मा को हल्का और निर्मल बनाना है।
Takeaway
यह पाठ हमें सिखाता है कि जैन साधना में अहिंसा अत्यंत सूक्ष्म और व्यापक है। साधक केवल जान-बूझकर की गई हिंसा ही नहीं, बल्कि अनजाने में हुई हिंसा के लिए भी विनयपूर्वक क्षमा मांगता है।