जैन धर्म के अनुसार दो प्रकार के संयोग
जैन धर्म के अनुसार "संयोग" का अर्थ है "संपर्क" या "मिलन"। जैन दर्शन में संयोग के दो प्रमुख प्रकार बताए गए हैं:
- द्रव्य संयोग (Physical Contact/Association of Substances)
इसका अर्थ है दो या अधिक द्रव्यों (substances) का एक-दूसरे के साथ संपर्क या मिलन। उदाहरण के लिए, जीव (आत्मा) का पुद्गल (मात्रा या पुद्गल द्रव्य) के साथ संपर्क, जिससे कर्म बंधन होता है।
- भाव संयोग (Psychical or Mental Association)
इसका अर्थ है आत्मा के भावों (mental states or passions) का संयोग या संपर्क। जब आत्मा में राग, द्वेष, मोह आदि भाव उत्पन्न होते हैं, तब उसे भाव संयोग कहा जाता है।
संक्षेप में:
- द्रव्य संयोग
- भाव संयोग
ये दोनों संयोग ही आत्मा के बंधन और मोक्ष के मार्ग में महत्वपूर्ण भूमिका निभाते हैं।