गुरु जिसने अपने शिष्य की पालकी उठाई
यह प्रसंग जैन धर्म के महान आचार्य श्री जिनदत्त सूरि (जिनदत्तसूरी, 1075–1154 ईस्वी) से जुड़ा है। यह घटना जैन इतिहास में "पालकी प्रसंग" (Palki Prasang) के नाम से प्रसिद्ध है।
कथा संक्षेप में: आचार्य श्री जिनदत्तसूरी राजस्थान के नागौर क्षेत्र में अपने शिष्य जिनचंद्रसूरी के साथ यात्रा कर रहे थे। उस समय के राजा ने आदेश दिया कि किसी भी साधु को नगर में पालकी (पालनक़ी) में बैठकर आना चाहिए, अन्यथा नगर में प्रवेश की अनुमति नहीं मिलेगी। जैन साधु अहिंसा, अपरिग्रह और विनय के कारण पालकी में बैठना अनुचित मानते हैं। जब आचार्य श्री जिनदत्तसूरी के शिष्य जिनचंद्रसूरी को पालकी में बैठने के लिए कहा गया, तो वे असमंजस में पड़ गए।
आचार्य श्री जिनदत्तसूरी ने गुरु-भक्ति तथा धर्म की मर्यादा को बनाए रखने के लिए स्वयं अपने शिष्य की पालकी उठाई और उसे नगर में प्रवेश दिलाया। यह कृत्य यह दर्शाता है कि जैन गुरु अपने शिष्यों के कल्याण के लिए किसी भी सीमा तक जा सकते हैं और धर्म के सिद्धांतों की रक्षा के लिए अपने अहंकार को छोड़ सकते हैं।
इस प्रसंग से शिक्षा:
- विनय, गुरु-भक्ति और त्याग का महत्व।
- जैन साधु-साध्वी अहिंसा और अपरिग्रह के पालन में कितने दृढ़ रहते हैं।
- धर्म की रक्षा के लिए अपना अहंकार त्याग देना चाहिए।
यह पालकी प्रसंग जैन संस्कृति में आज भी श्रद्धा और प्रेरणा का स्रोत है।