श्री गुरु अर्थात दिगंबर जैन आचार्य किस प्रकार की शिक्षा देते हैं
दिगंबर जैन आचार्य, जो जैन धर्म के सर्वोच्च मुनि होते हैं, अपने अनुयायियों को निम्नलिखित प्रकार की शिक्षा देते हैं:
- अहिंसा (Non-violence): आचार्य अहिंसा को सर्वोच्च धर्म बताते हैं। वे सिखाते हैं कि किसी भी प्राणी, मन, वचन या काया से हिंसा नहीं करनी चाहिए।
- सत्य (Truth): वे सत्य बोलने और सत्य मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं।
- अपरिग्रह (Non-possessiveness): आचार्य सिखाते हैं कि भौतिक वस्तुओं, इच्छाओं व संबंधों का त्याग करना चाहिए और जितना आवश्यक हो, उतना ही स्वीकार करना चाहिए।
- अस्तेय (Non-stealing): वे सिखाते हैं कि किसी की वस्तु बिना अनुमति के लेना या किसी प्रकार का छल-कपट करना वर्जित है।
- ब्रह्मचर्य (Celibacy/Chastity): ब्रह्मचर्य का पालन, अर्थात इंद्रिय संयम और शुद्ध जीवन जीने की प्रेरणा दी जाती है।
- आत्मा का शुद्धिकरण: आचार्य आत्मा की शुद्धि, आत्म-ज्ञान और मोक्ष प्राप्ति के मार्ग पर चलने की शिक्षा देते हैं।
- तप और संयम: वे तपस्या, उपवास, स्वाध्याय और संयमित जीवन को महत्त्वपूर्ण मानते हैं।
- सम्यक दर्शन, ज्ञान और चरित्र: आचार्य सम्यक (सही) दृष्टि, ज्ञान और आचरण को जीवन का आधार मानने की प्रेरणा देते हैं।
- श्रमण संस्कृति: वे सादगी, त्याग, विनम्रता और श्रमण (मुनि) जीवन के आदर्शों को अपनाने की शिक्षा देते हैं।
- समवसरण और प्रवचन: आचार्य धर्मसभा में प्रवचन द्वारा आगम (जैन शास्त्रों) का पाठ, व्याख्या एवं उसकी महत्ता समझाते हैं।
इस प्रकार, दिगंबर जैन आचार्य अपने अनुयायियों को आत्मकल्याण, समाज में शांति, और मोक्ष प्राप्ति की ओर अग्रसर होने के लिए प्रेरित करते हैं।