जडकर्म का आत्मा से दूध और पानी की तरह एकमेक में होना क्या है?
जैन दर्शन के अनुसार, "जडकर्म का आत्मा से दूध और पानी की तरह एकमेक में होना" का तात्पर्य यह है कि जैसे दूध और पानी एक बार मिल जाएँ तो उन्हें अलग करना कठिन होता है, वैसे ही आत्मा और कर्म बंध एक-दूसरे से अत्यंत सूक्ष्म रूप में संलग्न हो जाते हैं। आत्मा का स्वभाव शुद्ध, चेतन और स्वतंत्र है, जबकि कर्म पुद्गल (पदार्थ) हैं। लेकिन जब आत्मा के अशुद्ध भाव (राग, द्वेष, मोह आदि) उत्पन्न होते हैं, तब वह कर्मों को आकर्षित करती है और वे आत्मा से बंध जाते हैं।
इस बंध को "कर्मबंध" कहते हैं। जब तक आत्मा के भीतर राग-द्वेष आदि विकार रहते हैं, तब तक वह कर्मों से ऐसे संलग्न रहती है जैसे दूध में पानी मिल गया हो। यह बंधन अनादि से चला आ रहा है और मोक्ष प्राप्ति तक चलता रहता है। इसीलिए जैन आगमों में बताया गया है कि आत्मा को शुद्ध करने के लिए तप, संयम, सम्यक्दर्शन, सम्यक्ज्ञान और सम्यक्चारित्र का आचरण करना आवश्यक है, जिससे कर्मों का क्षय हो सके और आत्मा अपने मूल स्वरूप को प्राप्त कर सके।
संक्षेप में, आत्मा और कर्म का एकमेक होना, आत्मा की बंध अवस्था को दर्शाता है, जिसमें आत्मा और कर्म अलग-अलग होते हुए भी अत्यंत घनिष्ठ रूप से जुड़े रहते हैं—जैसे दूध और पानी।