Devsiya pratikaman vidhi in hindi
उत्तर
देवसीय प्रतिक्रमण जैन धर्म की दैनिक संध्याकालीन आत्म-शुद्धि साधना है। इसे दिनभर में मन, वचन और काया से हुए दोषों, पापों, प्रमाद, हिंसा, असत्य, चोरी, कषाय आदि की आलोचना, क्षमा और प्रायश्चित्त के लिए किया जाता है।
देवसीय प्रतिक्रमण की सामान्य विधि
देवसीय प्रतिक्रमण परंपरा और संघ के अनुसार थोड़ा अलग हो सकता है, इसलिए इसे अपने गुरु, साधु-साध्वी भगवंत या संघ में प्रचलित विधि के अनुसार करना श्रेष्ठ है। सामान्य रूप से इसकी भावना इस प्रकार होती है:
- शुद्ध स्थान पर बैठना: शांत, स्वच्छ स्थान पर बैठकर मन को स्थिर करें।
- सामायिक भाव: राग-द्वेष छोड़कर समता भाव धारण करें।
- नमस्कार महामंत्र: पंच परमेष्ठी को नमस्कार करके आराधना आरंभ करें।
- गुरु वंदन: गुरु भगवंतों के प्रति विनय और श्रद्धा प्रकट करें।
- आलोचना: दिनभर में हुए दोषों को याद करके स्वीकार करें।
- प्रतिक्रमण: जिन कार्यों से जीवों को दुःख हुआ, जिनमें प्रमाद हुआ, उनसे पीछे हटने का भाव करें।
- प्रत्याख्यान: आगे वही दोष न करने का संकल्प लें।
- क्षमा-याचना: सभी जीवों से क्षमा मांगें और सभी को क्षमा करें।
- कायोत्सर्ग: शरीर से अलग आत्मा की भावना करते हुए ध्यान करें।
- मंगल पाठ: अंत में मंगल भावना और आत्म-कल्याण की भावना करें।
सरल भावार्थ
देवसीय प्रतिक्रमण में साधक यह भावना करता है:
- आज दिन में मुझसे जो भी दोष हुए हों, मैं उनकी आलोचना करता/करती हूँ।
- मन, वचन, काया से किसी जीव को दुःख पहुँचा हो तो मैं क्षमा चाहता/चाहती हूँ।
- मैं सब जीवों को क्षमा करता/करती हूँ।
- मैं आगे अधिक सावधान, अहिंसक और संयमी जीवन जीने का संकल्प करता/करती हूँ।
महत्त्व
देवसीय प्रतिक्रमण केवल पाठ नहीं है, बल्कि आत्मा को पाप और कषाय से हल्का करने की साधना है। इसका मुख्य उद्देश्य है:
- आत्म-निरीक्षण
- दोषों की स्वीकृति
- क्षमा भाव
- अहिंसा और संयम की वृद्धि
- कर्म निर्जरा की भावना
ध्यान रखने योग्य बात
पूरी देवसीय प्रतिक्रमण विधि में अनेक सूत्र, गाथाएँ और क्रियाएँ आती हैं। उनके शब्द परंपरा अनुसार अत्यंत शुद्ध रूप से बोलने चाहिए। यदि आपको पूरा पाठ चाहिए, तो उसे अपने संघ, गुरु भगवंत या प्रमाणित प्रतिक्रमण पुस्तक से सीखना उचित है, क्योंकि sacred पाठ में एक भी शब्द बदलना उचित नहीं है।
Takeaway
देवसीय प्रतिक्रमण दिनभर के दोषों की आत्मिक सफाई है। इसका सार है — “मैं अपने दोषों को स्वीकार करता हूँ, सभी जीवों से क्षमा माँगता हूँ, और आगे अधिक जागरूक व संयमी जीवन जीने का संकल्प करता हूँ।”