प्रत्यक्ष रूप से दुख देने वाले कौन हैं
जैन धर्म के अनुसार प्रत्यक्ष रूप से दुख देने वाले हमारे अपने कर्म (कर्म बंध) हैं। जैन दर्शन में माना गया है कि आत्मा स्वयं शुद्ध, आनंदस्वरूप और शांत है, लेकिन जब वह अशुभ या शुभ कर्मों के बंधन में बंध जाती है, तो उसे संसार में दुख (दुःख), सुख, जन्म-मरण आदि का अनुभव करना पड़ता है।
जैन धर्म के अनुसार, बाहरी व्यक्ति या परिस्थितियाँ प्रत्यक्ष रूप से दुख देने वाली नहीं हैं; वे केवल निमित्त (occasion/factor) हैं। मुख्य कारण हमारा अपना कर्म है। इसीलिए कहा गया है: "कम्मं बंधेइ जीवो, कम्मं विणा न बंधइ" अर्थात् जीव अपने कर्मों से ही बंधता है, कर्म के बिना बंधन नहीं होता।
इस प्रकार, प्रत्यक्ष रूप से दुख देने वाले हमारे ही संचित एवं उदय में आए हुए कर्म हैं, न कि अन्य व्यक्ति या वस्तु।