jain muni skandhak kevalgyan
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जैन धर्म के अनुसार, जब कोई मुनि (श्रावक या साधु) 'केवलज्ञान' प्राप्त कर लेता है, तो वह 'केवलज्ञानी' कहलाता है। 'स्कंधक' शब्द का अर्थ होता है—वह मुनि जो अपने शरीर को छोड़कर केवलज्ञान प्राप्त करता है, अर्थात् मोक्ष के बहुत निकट पहुँच जाता है।
जैन आगमों के अनुसार, मुनियों के केवलज्ञान प्राप्त करने के बाद उनके शरीर से पाँच प्रकार के 'स्कंध' (पंच स्कंध) का क्षय हो जाता है—रूप, वेदना, संज्ञा, संस्कार, विज्ञान। केवलज्ञान प्राप्त मुनि तीर्थंकर भी हो सकते हैं या सामान्य केवलज्ञानी मुनि भी।
संक्षेप में:
- 'स्कंधक केवलज्ञान' का अर्थ है—वह अवस्था जब मुनि अपने कर्मों के अंतिम स्कंधों को नष्ट कर केवलज्ञान प्राप्त करता है।
- इस अवस्था में मुनि के सभी घातिया कर्म (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अंतराय) क्षीण हो जाते हैं और उसे सर्वज्ञता प्राप्त हो जाती है।
- यह जैन साधना और मोक्षमार्ग का अंतिम लक्ष्य है।
यदि आप और विस्तार से किसी विशेष ग्रंथ या उदाहरण (जैसे—महावीर स्वामी, गौतम गणधर आदि) के संदर्भ में जानना चाहते हैं, कृपया स्पष्ट करें।