Grastha jeevan ke 6 kartavya
जैन धर्म के अनुसार, गृहस्थ जीवन (गृहस्थाश्रम) में रहने वाले व्यक्ति के छह मुख्य कर्तव्य (षट्कर्तव्य) बताए गए हैं। ये कर्तव्य इस प्रकार हैं:
- सामायिक
प्रतिदिन कुछ समय आत्मचिंतन, ध्यान, और संयम के लिए निकालना। यह आत्मशुद्धि और आत्मनियंत्रण के लिए होता है।
- चतुरविंशतिस्तव
24 तीर्थंकरों की स्तुति, पूजा या वंदना करना। इससे श्रद्धा, भक्ति और सद्गुणों की प्रेरणा मिलती है।
- वंदना (गुरु-वंदना)
गुरु, साधु-साध्वियों का सम्मान और वंदना करना। इससे विनम्रता और सदाचार बढ़ता है।
- प्रतिक्रमण
दिन में या रात में अपने द्वारा किए गए पापों का चिंतन कर, उनका प्रायश्चित करना। इससे आत्मशुद्धि होती है।
- कायोत्सर्ग
शरीर को स्थिर रखकर आत्मा का ध्यान करना और शरीर के प्रति आसक्ति कम करना।
- प्रत्याख्यान (प्रत्याख्यान/पच्चखान)
आगे पाप न करने का संकल्प लेना, विशेषकर रात्रि में सोने से पहले, जैसे भोजन, जल आदि का त्याग।
इन छह कर्तव्यों का पालन करने से गृहस्थ जैन व्यक्ति आत्मिक उन्नति के मार्ग पर अग्रसर होता है।