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    इरिया वहियम् सूत्र की व्याखा डिटेल

    an hour ago 2

    Answer

    इरियावहियं सूत्र जैन धर्म का एक अत्यंत महत्वपूर्ण प्रतिक्रमण सूत्र है। इसका संबंध विशेष रूप से इर्या समिति यानी चलने-फिरने में सावधानी से है।

    इस सूत्र में साधक यह स्वीकार करता है कि चलते-फिरते समय, अनजाने में जिन सूक्ष्म या स्थूल जीवों को कष्ट पहुँचा हो, उनके लिए वह मिच्छामि दुक्कडं कहकर क्षमा मांगता है।

    यह सूत्र हमें सिखाता है कि Jain Dharma में अहिंसा केवल जानबूझकर हिंसा न करने तक सीमित नहीं है, बल्कि हर क्षण जागरूकता, सावधानी और आत्म-शुद्धि भी उसका भाग है।

    इरियावहियं सूत्र का मुख्य भाव

    इस सूत्र का मूल भाव है:

    • चलते समय यदि किसी जीव को कष्ट पहुँचा हो,
    • पैरों के नीचे कोई सूक्ष्म जीव आ गया हो,
    • वनस्पति, पानी, मिट्टी या छोटे-छोटे जीवों की हिंसा हुई हो,
    • बैठने, उठने, मुड़ने, चलने या रास्ते में असावधानी हुई हो,

    तो साधक विनम्रता से कहता है:

    “उस सभी पाप का मैं प्रतिक्रमण करता हूँ। उन सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ। मेरे द्वारा हुई भूल मिथ्या हो — मिच्छामि दुक्कडं।”

    शब्दार्थ और अर्थ

    इरिया / इर्या का अर्थ है — चलना, गमन करना। वहियं / वहियाए का संबंध चलने के व्यवहार से है।

    इसलिए इरियावहियं का सामान्य अर्थ है:

    चलने-फिरने से संबंधित दोषों का प्रतिक्रमण।

    जैन साधना में चलना भी साधारण क्रिया नहीं मानी गई है। चलने में भी जीवदया, सावधानी और संयम अपेक्षित है।

    यह सूत्र कब बोला जाता है?

    इरियावहियं सूत्र सामान्यतः प्रतिक्रमण में बोला जाता है। यह दैनिक आध्यात्मिक आत्म-परीक्षण का भाग है।

    विशेष रूप से:

    • देवसी प्रतिक्रमण में,
    • रायसी प्रतिक्रमण में,
    • सामायिक आदि क्रियाओं में,
    • और कई जैन परंपराओं में चलने-फिरने से हुए दोषों की क्षमा के लिए।

    इसका उद्देश्य केवल पाठ करना नहीं है, बल्कि भीतर से यह भाव जगाना है कि:

    “मैंने अनजाने में भी किसी जीव को दुख दिया हो, तो मैं उसके लिए पश्चाताप करता हूँ।”

    जैन दर्शन में इसका आधार

    जैन धर्म के अनुसार संसार में अनंत जीव हैं। केवल मनुष्य, पशु-पक्षी ही जीव नहीं हैं, बल्कि:

    • पृथ्वी-काय जीव,
    • जल-काय जीव,
    • अग्नि-काय जीव,
    • वायु-काय जीव,
    • वनस्पति-काय जीव,
    • और सूक्ष्म त्रस जीव

    भी जीव माने गए हैं।

    हमारे चलने, बैठने, उठने, बोलने, खाने-पीने जैसी क्रियाओं में भी अनजाने में हिंसा हो सकती है। इरियावहियं सूत्र इसी सूक्ष्म अहिंसा-बोध को जागृत करता है।

    इरियावहियं सूत्र में कौन-सी भावना होती है?

    इस सूत्र में मुख्यतः चार भाव हैं:

    • स्वीकार भाव: मुझसे भूल हो सकती है।
    • पश्चाताप भाव: यदि किसी जीव को दुख पहुँचा है, तो मुझे उसका खेद है।
    • क्षमा भाव: मैं सभी जीवों से क्षमा चाहता हूँ।
    • सावधानी भाव: आगे से अधिक जागरूक होकर चलूँगा।

    इर्या समिति से संबंध

    जैन आचार में पाँच समितियाँ बताई गई हैं। उनमें पहली है:

    इर्या समिति — चलने में सावधानी।

    इर्या समिति का अर्थ है कि साधक चलते समय ध्यान रखे कि:

    • जहाँ जीवों की हिंसा हो सकती है, वहाँ सावधानी रखे,
    • रास्ता देखकर चले,
    • असावधानी से पैर न रखे,
    • व्यर्थ दौड़ना, कूदना, लापरवाही से चलना टाले,
    • मन में अहिंसा का भाव रखे।

    इरियावहियं सूत्र इसी इर्या समिति में हुई चूक का प्रतिक्रमण है।

    गृहस्थ के लिए इसका महत्व

    गृहस्थ जीवन में पूर्ण अहिंसा संभव नहीं होती, क्योंकि दैनिक जीवन में अनेक आवश्यक क्रियाएँ करनी पड़ती हैं। फिर भी जैन गृहस्थ से अपेक्षा है कि वह:

    • अनावश्यक हिंसा न करे,
    • चलने-फिरने में सावधानी रखे,
    • भोजन, पानी, सफाई आदि में जीवदया का ध्यान रखे,
    • मन, वचन और काया से संयम रखे,
    • और प्रतिक्रमण द्वारा अपनी भूलों को शुद्ध करे।

    इरियावहियं सूत्र गृहस्थ को यह स्मरण कराता है कि अहिंसा केवल मंदिर या पूजा तक सीमित नहीं, बल्कि चलने के ढंग में भी होनी चाहिए।

    साधु-साध्वी के लिए इसका महत्व

    साधु-साध्वी भगवंतों के लिए इर्या समिति अत्यंत सूक्ष्म और कठोर आचरण का विषय है। वे चलते समय अत्यधिक सावधानी रखते हैं ताकि सूक्ष्म जीवों की हिंसा न हो।

    इरियावहियं सूत्र उनके लिए भी आत्म-परीक्षण और शुद्धि का साधन है। यह उन्हें निरंतर जागरूक रखता है कि साधना में लापरवाही न आए।

    मिच्छामि दुक्कडं का भाव

    इरियावहियं सूत्र के अंत में सामान्यतः मिच्छामि दुक्कडं का भाव आता है।

    मिच्छामि दुक्कडं का अर्थ है:

    “मेरे द्वारा हुआ दुष्कृत मिथ्या हो जाए।”

    अर्थात:

    • मैं उस पाप को स्वीकार करता हूँ,
    • उसका पश्चाताप करता हूँ,
    • आगे वैसा न करने का संकल्प करता हूँ,
    • और आत्मा को शुद्ध करने का प्रयास करता हूँ।

    आध्यात्मिक समझ

    इरियावहियं सूत्र केवल बाहरी जीवों से क्षमा मांगने का सूत्र नहीं है। यह अपनी आत्मा को जागृत करने का सूत्र है।

    यह हमें बताता है कि:

    • जीवन में हर क्रिया कर्म-बंधन का कारण बन सकती है,
    • असावधानी भी हिंसा का कारण बनती है,
    • अहिंसा का अर्थ है — संवेदनशीलता, सावधानी और करुणा,
    • प्रतिक्रमण आत्मा की सफाई है।

    जब साधक इस सूत्र को भावपूर्वक बोलता है, तो उसके भीतर विनय, करुणा और जागरूकता बढ़ती है।

    व्यवहार में कैसे अपनाएं?

    इरियावहियं सूत्र का अभ्यास केवल पाठ तक सीमित न रहे। इसे जीवन में इस प्रकार अपनाया जा सकता है:

    • चलते समय लापरवाही न करें।
    • रात में अनावश्यक चलना-फिरना कम करें।
    • पानी, भोजन और वस्तुओं का उपयोग सावधानी से करें।
    • अनावश्यक सफाई, आग, रसायन आदि से जीव हिंसा न करें।
    • कीड़ों-मकोड़ों को मारने के बजाय बचाने का प्रयास करें।
    • दैनिक प्रतिक्रमण में अपने दिन की भूलों को याद करें।

    Takeaway

    इरियावहियं सूत्र जैन अहिंसा की सूक्ष्मता का सुंदर प्रतीक है।

    यह हमें सिखाता है कि धर्म केवल बड़े व्रतों में नहीं, बल्कि छोटे-छोटे कदमों में भी है। चलते समय भी यदि मन में जीवदया, सावधानी और क्षमा का भाव रहे, तो वही जैन साधना है।

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