Mithyatva ke 5 Prakar
जैन दर्शन के अनुसार, 'मिथ्यात्व' का अर्थ है—असम्यक दृष्टि, अर्थात् सत्य-मार्ग, तत्त्व, और वास्तविकता का गलत या विकृत ज्ञान। मिथ्यात्व को पाँच प्रकारों में विभाजित किया गया है:
- एकान्त मिथ्यात्व (Ekant Mithyatva)
किसी एक ही तत्त्व को सत्य मानकर अन्य तत्त्वों का निषेध करना। उदाहरण: केवल आत्मा ही है, शरीर या कर्म नहीं हैं।
- विपरीत मिथ्यात्व (Viparit Mithyatva)
सही को गलत और गलत को सही समझना। उदाहरण: अहिंसा को हेय और हिंसा को श्रेष्ठ समझना।
- संशय मिथ्यात्व (Sanshay Mithyatva)
सत्य और असत्य में संदेह करना। उदाहरण: आत्मा है या नहीं, इसमें संदेह होना।
- अगृह मिथ्यात्व (Agrah Mithyatva)
सत्य को पकड़ने की इच्छा न रखना, या तत्त्वज्ञान के प्रति उदासीन रहना।
- विकल्प मिथ्यात्व (Vikalp Mithyatva)
तत्त्वों के बारे में अनेक प्रकार के विकल्प या कल्पनाएँ करना, जैसे कि आत्मा अनेक रूपों में है या उसका कोई निश्चित स्वरूप नहीं है।
ये पाँच प्रकार के मिथ्यात्व जीव को सम्यक् दर्शन (सही दृष्टिकोण) से दूर रखते हैं और संसार में बांधते हैं। सम्यक् दर्शन प्राप्त करने हेतु इन मिथ्यात्वों का त्याग आवश्यक है।