देखो मैं यह नहीं कह रहा हूं कि तीर्थंकर का काम यही होता है कि वह हमेशा आत्म कल्याण के लिए ही होते हैं लेकिन एक प्रश्न मेरे अंदर उठना है कि अगर अपने पास जो पूरे 12 अंग हैं अगर वह आज अपने पास उपलब्ध होते तो उसमें भी 63 सलाह का पुरुषों का वर्णन मिलता है
Answer
हाँ, जैन परंपरा के अनुसार यदि आज मूल रूप में पूरे 12 अंग उपलब्ध होते, तो उनमें शलाकापुरुषों से संबंधित वर्णन अवश्य मिलता।
विशेष रूप से 12वाँ अंग — दृष्टिवाद अत्यंत विशाल माना गया है, और उसमें अनेक चरित्र, इतिहास, पूर्व, तत्त्व-विचार और विस्तृत ज्ञान-विषय सम्मिलित माने जाते हैं। परंपरा के अनुसार दृष्टिवाद अंग आज उपलब्ध नहीं है।
Explanation
जैन परंपरा में 63 शलाकापुरुष महान पुरुष माने गए हैं। इनमें सामान्यतः शामिल हैं:
- 24 तीर्थंकर
- 12 चक्रवर्ती
- 9 बलदेव
- 9 वासुदेव
- 9 प्रतिवासुदेव
इन महापुरुषों के जीवन-चरित्र, धर्म-प्रभावना, कर्म-सिद्धांत, संसार-चक्र और मोक्षमार्ग से जुड़े प्रसंग जैन आगमिक और उत्तरागमिक साहित्य में वर्णित मिलते हैं।
आज जो विस्तृत रूप से 63 शलाकापुरुषों का वर्णन प्रसिद्ध है, वह विशेष रूप से बाद के प्रामाणिक जैन ग्रंथों में मिलता है, जैसे:
- त्रिषष्टिशलाकापुरुष चरित्र — आचार्य हेमचंद्र द्वारा
- महापुराण — दिगंबर परंपरा में आचार्य जिनसेन और गुणभद्र द्वारा
- अन्य पुराण और चरित्र-ग्रंथ
लेकिन इसका अर्थ यह नहीं है कि यह विषय आगमिक परंपरा से अलग है। इन चरित्रों की आधारभूमि जैन परंपरा में प्राचीन मानी जाती है।
Spiritual Understanding
तीर्थंकर केवल अपना आत्मकल्याण करने वाले नहीं होते। वे स्वयं सिद्धत्व की दिशा में पूर्ण पुरुषार्थ करते हैं और साथ ही तीर्थ की स्थापना करते हैं — अर्थात् साधु, साध्वी, श्रावक और श्राविका रूप चतुर्विध संघ की रचना करते हैं।
उनका मुख्य कार्य है:
- मोक्षमार्ग का उपदेश देना
- सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र की स्थापना करना
- जीवों को आत्मकल्याण की दिशा दिखाना
शलाकापुरुषों के चरित्र इसलिए महत्वपूर्ण हैं क्योंकि वे हमें बताते हैं कि संसार में महान सामर्थ्य, राज्य, बल, वैभव और विजय भी अंततः कर्म और आत्मा के नियमों से बंधे हैं। केवल वीतरागता और मोक्षमार्ग ही अंतिम कल्याण का मार्ग है।
Takeaway
संक्षेप में, यदि 12 अंग पूर्ण रूप में आज उपलब्ध होते, तो जैन परंपरा की दृष्टि से 63 शलाकापुरुषों से संबंधित सामग्री उनमें मिलने की पूरी संभावना मानी जाती है, विशेषकर दृष्टिवाद जैसे विशाल अंग में। आज उनका व्यवस्थित वर्णन हमें आगमिक परंपरा पर आधारित बाद के प्रामाणिक जैन चरित्र-ग्रंथों में मिलता है।