सामायिक लेणे एवं पारणे ki विधी
Answer
सामायिक लेणे का अर्थ है — निश्चित समय के लिए समता, अहिंसा, संयम और आत्मचिंतन में स्थित होने का संकल्प लेना। सामायिक पारणे का अर्थ है — सामायिक का समय पूर्ण होने पर विधिपूर्वक समापन करना।
सामान्य रूप से सामायिक की अवधि 48 मिनट मानी जाती है।
सामायिक लेणे की सामान्य विधि
- शरीर, वस्त्र और स्थान की शुद्धि रखें।
- शांत, स्वच्छ स्थान पर बैठें।
- मुखपट्टी, चरवला/रजोहरण आदि परंपरा अनुसार रखें।
- मन में यह भाव रखें कि अब मैं राग-द्वेष, हिंसा, असत्य, अशुभ विचार और सांसारिक आसक्ति से दूर रहकर समता में रहूंगा/रहूंगी।
- गुरु, जिनेन्द्र भगवान और पंच परमेष्ठी को नमस्कार करें।
- नवकार मंत्र का स्मरण करें।
- परंपरा अनुसार सामायिक लेने के सूत्र बोले जाते हैं।
- फिर 48 मिनट तक स्वाध्याय, जप, ध्यान, प्रतिक्रमण, आत्मचिंतन या शांत भाव में रहें।
सामायिक के समय ध्यान रखने योग्य बातें
- किसी जीव को कष्ट न हो, इसका विशेष ध्यान रखें।
- अनावश्यक बोलना, चलना, हंसना, क्रोध करना, मोबाइल आदि का उपयोग न करें।
- मन, वचन और काया को यथासंभव संयमित रखें।
- राग-द्वेष से बचने का प्रयास करें।
- सब जीवों के प्रति मैत्री और क्षमा भाव रखें।
सामायिक पारणे की सामान्य विधि
- 48 मिनट पूर्ण होने पर शांत भाव से सामायिक का समापन करें।
- जिनेंद्र भगवान, गुरु और पंच परमेष्ठी को नमस्कार करें।
- यदि सामायिक के दौरान मन, वचन या काया से कोई भूल हुई हो तो क्षमा भाव रखें।
- परंपरा अनुसार सामायिक पारणे के सूत्र बोले जाते हैं।
- अंत में मंगल भावना, मैत्री भावना और क्षमापना भाव रखें।
Spiritual Understanding
सामायिक केवल बैठने की क्रिया नहीं है। यह आत्मा को समता में लाने की साधना है। सामायिक में श्रावक कुछ समय के लिए साधु-साध्वी जैसे संयमित भावों का अभ्यास करता है।
इसका मुख्य उद्देश्य है:
- राग-द्वेष को कम करना
- अहिंसा का पालन करना
- आत्मा की ओर ध्यान लगाना
- पाप कर्मों से बचना
- समता भाव बढ़ाना
Important Note
सामायिक लेणे और पारणे के सटीक सूत्र अलग-अलग जैन परंपराओं में भिन्न हो सकते हैं — जैसे श्वेतांबर मूर्तिपूजक, स्थानकवासी, तेरापंथी आदि में विधि और पाठ में कुछ अंतर हो सकता है।
इसलिए यदि आपको शुद्ध पाठ सहित विधि चाहिए, तो अपनी परंपरा के गुरु भगवंत, साधु-साध्वीजी, उपाध्यायजी या ज्ञानी श्रावक-श्राविका से सीखना श्रेष्ठ है।
Takeaway
सामायिक का सार है — “कुछ समय के लिए संसार से हटकर आत्मा, समता, अहिंसा और क्षमा में स्थिर होना।”