अगर भगवान को मूरत को देखते ही आसू रुके ही नहीं ऐसा क्यों होता है कारण
उत्तर
भगवान की मूर्ति देखते ही आँसू रुकते नहीं, तो Jain Dharma की दृष्टि से यह अक्सर भक्ति, श्रद्धा, विनय और आत्मा की आंतरिक भावुकता का परिणाम माना जाता है। जब मन भगवान के शांत, वीतराग और पवित्र स्वरूप से जुड़ता है, तब भीतर दबे हुए भाव आँसू के रूप में बाहर आ सकते हैं।
कारण
ऐसा होने के कुछ सामान्य कारण हो सकते हैं:
- गहरी श्रद्धा: भगवान के दर्शन से मन में अत्यंत आदर और भक्ति जागती है।
- विनय भाव: भगवान के वीतराग स्वरूप के सामने अहंकार कम होता है और हृदय नरम हो जाता है।
- आत्मिक शांति: मंदिर या मूर्ति के दर्शन से मन को शांति मिलती है, जिससे भावनाएँ सहज रूप से बह सकती हैं।
- पश्चाताप या अंतरदर्शन: भगवान के सामने अपने दोष, कषाय या भूलें याद आ सकती हैं, जिससे नम्रता और पश्चाताप के आँसू आ सकते हैं।
- पूर्व संस्कार: कुछ आत्माओं में धर्म और भक्ति के संस्कार गहरे होते हैं, इसलिए दर्शन मात्र से भाव जागृत हो जाते हैं।
जैन दृष्टि से समझ
जैन धर्म में भगवान राग-द्वेष से रहित, वीतराग होते हैं। वे किसी को प्रसन्न या अप्रसन्न करने वाले नहीं हैं। उनके दर्शन से हमारे भीतर अपने आत्मस्वरूप की याद जागती है। आँसू यदि शुद्ध भक्ति, नम्रता, वैराग्य और आत्म-जागृति से आते हैं, तो वे शुभ भाव माने जा सकते हैं।
लेकिन केवल भावुकता में रुक जाना पर्याप्त नहीं है। उस भाव को जीवन में उतारना जरूरी है:
- अहिंसा का पालन
- क्रोध, मान, माया, लोभ को कम करना
- सम्यक दर्शन की भावना
- नमस्कार मंत्र, पूजा, स्वाध्याय और संयम
Takeaway
भगवान की मूर्ति देखकर आँसू आना कोई बुरी बात नहीं है। यह हृदय की भक्ति और आत्मा की कोमलता का संकेत हो सकता है। ऐसे समय में शांत भाव से प्रार्थना करें:
“हे वीतराग प्रभु, मुझे भी राग-द्वेष से मुक्त होने की शक्ति और सही मार्ग पर चलने की प्रेरणा मिले।”