साधु साध्वियां का तीसरा पैर
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Answer
जैन परंपरा में साधु-साध्वियों का “तीसरा पैर” आमतौर पर उनके हाथ में रहने वाले राजोहरण / ओघो को कहा जाता है।
Explanation
साधु-साध्वियां चलते समय बहुत सावधानी रखते हैं ताकि सूक्ष्म जीवों की हिंसा न हो। इसलिए वे अपने मार्ग, बैठने की जगह आदि को राजोहरण से धीरे-धीरे साफ करते हैं।
इसी कारण राजोहरण को भावपूर्वक “तीसरा पैर” कहा जाता है, क्योंकि:
- यह संयम जीवन में निरंतर साथ रहता है।
- यह अहिंसा की जागरूकता का प्रतीक है।
- यह साधु-साध्वी को हर कदम पर सावधान रहने की याद दिलाता है।
Spiritual Understanding
राजोहरण केवल एक वस्तु नहीं है, बल्कि Jain Dharma में अहिंसा, सावधानी और संयम का प्रतीक है। यह दर्शाता है कि साधु-साध्वी का प्रत्येक कदम जीव-दया और आत्म-साधना से जुड़ा होता है।
Takeaway
साधु-साध्वियों का “तीसरा पैर” राजोहरण कहलाता है, जो उनके अहिंसामय और सावधान जीवन का पवित्र प्रतीक है।