नाणंमि दंसणंमि अ, चरणंमि तवंमि तह य वीरियंमि आयरणं आयारो, ईय एसो पंचहा भणिओ ॥ ज्ञानाचार, दर्शनाचार, चारित्राचार, तपाचार, वीर्याचार; ए पंचविध आचारमांहि अनेरो जे कोई अतिचार पक्ष दिवसमांहि सूक्ष्म बादर जाणतां अजाणतां हुओ होय, ते सवि हु मने, वचने, कायाए करी
उत्तर
यह पाठ श्रावक प्रतिक्रमण में बोले जाने वाले “अतिचार” का विस्तृत पाठ है। इसमें श्रावक अपने धर्म-पालन में हुए दोषों की आलोचना करता है और अंत में कहता है:
“मिच्छा मि दुक्कडं” अर्थात् — मेरे द्वारा मन, वचन और काया से जो भी दोष हुआ हो, वह मिथ्या हो; मैं उसकी क्षमा चाहता हूँ।
मुख्य भाव
इस पाठ में मुख्य रूप से इन बातों की आत्म-स्वीकृति और क्षमा-याचना है:
- ज्ञानाचार — ज्ञान, शास्त्र, गुरु और अध्ययन के प्रति हुए दोष।
- दर्शनाचार — सम्यग्दर्शन, देव-गुरु-धर्म में श्रद्धा से जुड़े दोष।
- चारित्राचार — आचरण, समितियाँ, गुप्तियाँ और संयम से जुड़े दोष।
- श्रावक के बारह व्रत — अहिंसा, सत्य, अचौर्य, ब्रह्मचर्य, अपरिग्रह आदि व्रतों में हुए अतिचार।
- संलेखना — जीवन, मृत्यु, परलोक और भोगों की इच्छाओं से जुड़े दोष।
- तपाचार — बाह्य और आभ्यंतर तप में हुई प्रमादपूर्ण चूकें।
- वीर्याचार — धर्म में शक्ति होते हुए भी पुरुषार्थ न करने का दोष।
अर्थ सरल भाषा में
श्रावक कहता है:
मैंने ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप और वीर्य — इन पाँच आचारों में, तथा सम्यक्त्व और बारह व्रतों में, जानकर या अनजाने में, सूक्ष्म या स्थूल रूप से, मन-वचन-काया से जो भी दोष किए हों, उन सबके लिए मैं पश्चात्ताप करता हूँ और क्षमा चाहता हूँ।
“अतिचार” का अर्थ
अतिचार का अर्थ है — व्रत या धर्म-नियम को पूर्ण रूप से तोड़ना नहीं, परंतु उसमें दोष लग जाना।
उदाहरण के लिए:
- अहिंसा-व्रत लिया है, परंतु असावधानी से जीव-हिंसा हो गई।
- सत्य-व्रत लिया है, परंतु किसी को दुःख देने वाला या भ्रमित करने वाला वचन बोल दिया।
- सामायिक की, परंतु मन स्थिर नहीं रहा।
- तप किया, परंतु उसमें प्रमाद या दिखावा आ गया।
ऐसे दोषों को पहचानकर उनकी आलोचना करना ही प्रतिक्रमण का मूल भाव है।
आध्यात्मिक समझ
यह पाठ केवल “गलतियों की सूची” नहीं है। इसका उद्देश्य है:
- अपने जीवन को धर्म-दृष्टि से जांचना,
- प्रमाद को पहचानना,
- अहिंसा और संयम के प्रति जागरूक होना,
- गुरु, शास्त्र और जिनवाणी के प्रति विनय रखना,
- और अंत में आत्मा को अधिक निर्मल बनाना।
जैन धर्म में प्रतिक्रमण का भाव है — जो अशुभ हुआ उससे पीछे हटना और शुभ मार्ग की ओर लौटना।
Takeaway
इस पूरे पाठ का सार यही है:
“हे जिनेन्द्र प्रभु! ज्ञान, दर्शन, चारित्र, तप, व्रत, सामायिक, दान, विनय और धर्म-पुरुषार्थ में जो भी चूक हुई हो, उसके लिए मैं हृदय से पश्चात्ताप करता हूँ — मिच्छा मि दुक्कडं।”