जिससे करनी चाहिए उससे नहीं करते है genaral question
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Answer
अगर आपका मतलब है: “जिससे जैसा व्यवहार करना चाहिए, वैसा हम नहीं करते” — तो जैन धर्म के अनुसार यह अक्सर राग-द्वेष, अहंकार, अपेक्षा, मोह और प्रमाद के कारण होता है।
Explanation
हम कई बार जानते हैं कि:
- बड़ों का सम्मान करना चाहिए, फिर भी नहीं करते।
- जिनसे क्षमा मांगनी चाहिए, उनसे नहीं मांगते।
- जिनके प्रति कृतज्ञ होना चाहिए, उनके प्रति उदासीन रहते हैं।
- जहाँ विनम्रता चाहिए, वहाँ अहंकार आ जाता है।
जैन दृष्टि से यह आत्मा की शुद्ध प्रकृति नहीं है, बल्कि कषाय — क्रोध, मान, माया, लोभ — का प्रभाव है।
Spiritual Understanding
जैन धर्म हमें सिखाता है कि सही व्यक्ति के प्रति सही भाव रखना भी साधना है।
- जिससे क्षमा मांगनी हो, उससे क्षमा मांगना चाहिए।
- जिसका उपकार हो, उसके प्रति कृतज्ञता रखनी चाहिए।
- जिससे सीख मिली हो, उसके प्रति विनय रखना चाहिए।
- जिसे दुख दिया हो, उसके प्रति पश्चाताप और सुधार का भाव रखना चाहिए।
यह सब सम्यक भाव की ओर ले जाता है।
Takeaway
जैन धर्म में केवल बाहरी आचरण नहीं, बल्कि भाव की शुद्धि महत्त्वपूर्ण है। जिससे जैसा धर्मपूर्ण व्यवहार करना चाहिए, वैसा करना ही विनय, क्षमा और आत्म-सुधार की शुरुआत है।