Kurgulu Muni purv Bhav Mein Kiska Abhiman kya
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कुर्गुलु मुनि के पूर्व भव का वर्णन जैनागमों में मिलता है। उनके पूर्व भव में वे एक राजा थे, जिनमें 'अभिमान' (अहंकार) की भावना थी। वे अपने पद, वैभव और बल का अभिमान रखते थे। इसी अभिमान के कारण उन्होंने धर्म का मार्ग नहीं अपनाया और अपने अहंकारवश गलत कार्य किए। आगे चलकर, जब उन्हें अपने कर्मों का फल मिला और उन्होंने पश्चाताप किया, तब वे मुनि बनकर सही मार्ग पर आए और तपस्या की।
इससे यह शिक्षा मिलती है कि अभिमान (अहंकार) का त्याग और विनम्रता का आचरण जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण है। अहंकार बंधन का कारण है और विनम्रता मोक्ष का मार्ग है।
संदर्भ: यह कथा जैन आगम ग्रंथों और चरित्र कथाओं में मिलती है, जिसमें अभिमान के परिणामस्वरूप भव-भ्रमण और पश्चाताप से मोक्षमार्ग पर चलने की प्रेरणा दी जाती है।