Kis leshya se jiv tirthankar banta hai
जैन धर्म के अनुसार, जीव तभी तीर्थंकर बन सकता है जब उसमें शुक्ललेश्या (Shukla Leshya) होती है। शुक्ललेश्या दो प्रकार की होती है—शुक्ल और परम शुक्ल। तीर्थंकर बनने के लिए परम शुक्ललेश्या अनिवार्य है। यह लेश्या अत्यंत शुद्ध, निर्मल और पवित्र होती है, जिसमें जीव का मन, वचन और काय पूर्णतः शुद्ध और अहिंसक हो जाता है।
छः प्रकार की लेश्याएँ होती हैं:
- कृष्ण (काली)
- नील (नीली)
- कपोत (कबूतर जैसी)
- तीप्त (गहरे पीले रंग की)
- पद्म (कमल जैसी)
- शुक्ल (सफेद)
इनमें से अंतिम और सर्वोच्च शुक्ललेश्या है, और इसी के प्रभाव से जीव तीर्थंकर पद को प्राप्त करता है। सारांश: तीर्थंकर बनने के लिए जीव में शुक्ललेश्या (विशेषतः परम शुक्ल) होनी चाहिए।