ज्ञानं पूजां कुलं जातिं बलमृद्धिं तपो वपुः किस ग्रंथ में निहित है
Answer
यह पंक्ति जैन परंपरा में प्रसिद्ध “ज्ञानं पूजां कुलं जातिं बलमृद्धिं तपो वपुः” गाथा/सूत्र के रूप में जानी जाती है, जो आठ मद — अष्ट मद का वर्णन करती है।
लेकिन यह किस मूल आगम या प्राचीन ग्रंथ में ठीक इसी रूप में निहित है, इसके बारे में मैं पर्याप्त निश्चितता से प्रमाणित ग्रंथ-नाम नहीं बता सकता।
इसलिए: Sorry, I can only provide information that is clearly established within Jain tradition.
Explanation
इस पंक्ति में जिन आठ प्रकार के अभिमान/मद बताए जाते हैं, वे हैं:
- ज्ञान मद — ज्ञान का अहंकार
- पूजा मद — सम्मान/पूजा का अहंकार
- कुल मद — श्रेष्ठ कुल का अहंकार
- जाति मद — जाति का अहंकार
- बल मद — शक्ति का अहंकार
- ऋद्धि मद — वैभव/सिद्धि का अहंकार
- तप मद — तपस्या का अहंकार
- वपु मद — शरीर/रूप का अहंकार
Spiritual Understanding
जैन धर्म में ये आठ मद आत्मकल्याण में बाधक माने गए हैं। साधक के लिए विनय, नम्रता और अहंकार-त्याग अत्यंत आवश्यक हैं।
Takeaway
इस पंक्ति का भाव जैन धर्म में स्पष्ट रूप से मान्य है—यह अष्ट मद का उपदेश देती है। परंतु इसके सटीक ग्रंथ-स्रोत के बारे में बिना प्रमाण के ग्रंथ-नाम बताना उचित नहीं होगा।