ओं ह्रीं श्रीं क्लीं ऐं अर्हं वं मं हं सं तं पं वंवं मंमं हंहं संसं तंतं पंपं झंझं झ्वीं झ्वीं क्ष्वीं क्ष्वीं द्रां द्रां द्रीं द्रीं द्रावय-द्रावय नमोऽर्हते भगवते श्रीमते ओं ह्रीं क्रों अस्माकं पापं खण्डय खण्डय जहि-जहि दह-दह पच-पच पाचय पाचय ओं नमो अर्हन
उत्तर
आपने जो पाठ भेजा है, यह जैन परम्परा में प्रचलित शान्तिधारा / शान्ति-विधान / जिनाभिषेक-पूजन के अवसर पर बोले जाने वाले मंगल-शान्ति मंत्रों जैसा प्रतीत होता है। इसमें अरिहन्त परमात्मा, तीर्थंकर भगवंतों, श्री पार्श्वनाथ प्रभु और श्री शान्तिनाथ प्रभु की स्तुति, शान्ति-प्रार्थना, विघ्न-निवारण, रोग-शोक-भय की निवृत्ति और धर्म-वृद्धि की मंगलकामना की गई है।
सरल अर्थ
इस पाठ का मुख्य भाव यह है:
- अरिहन्त भगवंतों को नमस्कार।
- हमारे पाप, अशुभ कर्म, विघ्न, रोग, भय और उपसर्ग दूर हों।
- सद्धर्म, शान्ति, आरोग्य, आयु, बल, ऐश्वर्य और कल्याण की वृद्धि हो।
- चौबीस तीर्थंकर भगवंत हमारी आध्यात्मिक और धार्मिक कार्यों में सिद्धि प्रदान करें।
- श्री पार्श्वनाथ प्रभु और श्री शान्तिनाथ प्रभु के स्मरण से उपसर्ग, विघ्न और अशान्ति शांत हो।
- पूजक, प्रतिपालक, साधु-साध्वी, श्रावक-श्राविका, देश, नगर और समाज में शान्ति हो।
आध्यात्मिक समझ
जैन धर्म में ऐसे मंत्रों का उद्देश्य किसी लौकिक चमत्कार की अपेक्षा से अधिक आत्मशुद्धि, शुभ भाव, सम्यक् श्रद्धा और शान्ति की भावना जागृत करना है।
इस पाठ में बार-बार आने वाले शब्द जैसे:
- शान्तिरस्तु — शान्ति हो।
- कल्याणमस्तु — कल्याण हो।
- आरोग्यमस्तु — आरोग्य हो।
- सद्धर्म-वृद्धिरस्तु — सद्धर्म की वृद्धि हो।
- सर्वविघ्न-निवारणार्थम् — सभी विघ्नों की शान्ति के लिए।
ये सब मंगलभावना के प्रतीक हैं।
महत्वपूर्ण सावधानी
इस पाठ में कई बीजाक्षर, मंत्राक्षर और विशेष प्रयोगात्मक वाक्य हैं। ऐसे मंत्रों का उच्चारण पारम्परिक रूप से आचार्य, उपाध्याय, ज्ञानी पंडित या विधि-विशारद के मार्गदर्शन में करना उचित माना जाता है, क्योंकि मंत्र-पाठ में शब्द, उच्चारण और विधि की शुद्धता महत्त्वपूर्ण होती है।
यदि आपका उद्देश्य सामान्य भक्ति और शान्ति-भाव है, तो जैन परम्परा में सर्वमान्य और अत्यंत पवित्र मंत्र है:
णमो अरिहंताणं
णमो सिद्धाणं
णमो आयरियाणं
णमो उवज्झायाणं
णमो लोए सव्वसाहूणं
यह नवकार महामंत्र सभी जैन परम्पराओं में सर्वोच्च मंगलमय मंत्र माना जाता है।
Takeaway
इस पूरे पाठ का सार है: अरिहन्त परमात्मा और तीर्थंकर भगवंतों की भक्ति द्वारा आत्मशुद्धि, शान्ति, धर्म-वृद्धि, विघ्न-निवारण और सर्वजीव कल्याण की मंगल भावना।