जैन धर्म में उपकरण के भेद
जैन धर्म में "उपकरण" (उपकरण) का अर्थ है—वह वस्तुएँ या साधन, जिनका उपयोग पूजा, साधना या भक्ति के समय किया जाता है। जैन आगमों एवं परंपराओं में उपकरण के विभिन्न भेद (प्रकार) बताए गए हैं। मुख्यतः उपकरण दो प्रकार के माने जाते हैं:
- नैष्ठिक उपकरण
ये वे उपकरण हैं, जो साधु-साध्वियाँ (मोक्षमार्गी) द्वारा आत्म-कल्याण और साधना के लिए उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण: - कमंडलु (पानी रखने का पात्र) - मुहपति (मुख पर बांधने वाला कपड़ा) - पिच्छी (पंखों से बना झाड़न) - ओघा (कपड़ा) - पुस्तक (शास्त्र) - चौरासन (बैठने की चौकी)
- लौकिक उपकरण
ये वे उपकरण हैं, जो गृहस्थों द्वारा पूजा, आरती, अभिषेक आदि धार्मिक कार्यों के लिए उपयोग किए जाते हैं। उदाहरण: - दीपक (दीया) - अगरबत्ती - कलश (घड़ा) - घंटी - पूजन की थाली - जल पात्र
आचार्य जिनसेन द्वारा ‘पर्युषण महापर्व’ में उपकरण के 8 भेद बताये गए हैं:
- पाद्य (पैर धोने का जल)
- अर्घ्य (पुष्पादि से बना अर्घ्य)
- पुष्प
- धूप
- दीप
- नैवेद्य (भोग)
- फल
- जल
संक्षेप में: जैन धर्म में उपकरण के भेद साधुओं-साध्वियों के लिए और गृहस्थों के लिए अलग-अलग होते हैं। इनका उपयोग साधना, पूजा, और आत्म-शुद्धि के लिए किया जाता है, साथ ही इनमें अहिंसा और अपरिग्रह का विशेष ध्यान रखा जाता है।