कषाय की उत्पत्ति कैसे होती है और उनका नाश का उपाय
Answer
जैन धर्म में कषाय आत्मा के वे आंतरिक विकार हैं जो आत्मा को कर्मों से बाँधते हैं। मुख्य चार कषाय हैं:
- क्रोध
- मान — अहंकार
- माया — कपट
- लोभ
कषाय की उत्पत्ति मिथ्यात्व, अविवेक, राग-द्वेष, आसक्ति और कर्मों के उदय से होती है। उनका नाश सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान, सम्यक्चरित्र, तप, संयम, क्षमा और आत्म-जागृति से होता है।
Explanation
कषाय तब पैदा होती है जब जीव बाहरी वस्तुओं, शरीर, परिवार, मान-सम्मान, धन, सुख आदि को “मेरा” मानकर उनमें आसक्त हो जाता है।
उदाहरण के लिए:
- मनचाही बात न हो तो क्रोध उत्पन्न होता है।
- अपने को बड़ा मानने से मान उत्पन्न होता है।
- स्वार्थ के लिए छल करने से माया उत्पन्न होती है।
- अधिक पाने की इच्छा से लोभ उत्पन्न होता है।
जैन दर्शन के अनुसार कषाय का मूल कारण आत्मा का अपने शुद्ध स्वरूप को भूल जाना है। जब जीव शरीर और सांसारिक पदार्थों में “मैं” और “मेरा” भाव करता है, तब राग-द्वेष बढ़ते हैं और कषाय मजबूत होती हैं।
कषाय के नाश के उपाय
- सम्यग्दर्शन: आत्मा, कर्म, पुण्य-पाप, बंध-मोक्ष आदि तत्त्वों में श्रद्धा रखना।
- स्वाध्याय: जिनवाणी, आगम और धर्मग्रंथों का अध्ययन करना।
- प्रतिक्रमण: अपने दोषों को स्वीकार करके पश्चाताप करना।
- क्षमा: दूसरों के प्रति द्वेष न रखना और क्षमा-भाव रखना।
- विनय: अहंकार कम करना और नम्रता अपनाना।
- सत्य और सरलता: कपट छोड़कर सरल जीवन जीना।
- संतोष: लोभ को कम करने के लिए इच्छाओं को सीमित करना।
- तप: बाह्य और आंतरिक तप से इंद्रियों और मन को संयमित करना।
- ध्यान: आत्मा के शुद्ध स्वरूप का चिंतन करना।
- संयम: मन, वचन और काया को सावधान रखना।
Spiritual Understanding
कषाय आत्मा को संसार में भटकाती हैं। ये कर्मबंध का प्रमुख कारण हैं। जब तक कषाय रहती हैं, तब तक आत्मा का शुद्ध ज्ञान, दर्शन और आनंद प्रकट नहीं होता।
इसलिए जैन साधना का मुख्य उद्देश्य कषायों को कमजोर करना और अंत में उनका पूर्ण क्षय करना है। क्रोध के स्थान पर क्षमा, मान के स्थान पर विनय, माया के स्थान पर सरलता, और लोभ के स्थान पर संतोष लाना ही कषाय-क्षय का मार्ग है।
Takeaway
कषाय की उत्पत्ति राग-द्वेष और मोह से होती है, और उनका नाश सम्यग्दर्शन, संयम, तप, स्वाध्याय, क्षमा और आत्मचिंतन से होता है। कषाय घटती है तो आत्मा की शुद्धता प्रकट होने लगती है।