की जॉब के जो 108 मोती होते हैं वह क्या स्पष्ट करते हैं समझ कर स्पष्ट कीजिए दिगंबर तरफ से
उत्तर
दिगंबर जैन परंपरा में जप-माला के 108 मोती आत्मा की शुद्धि, गुणों की स्मृति और साधना की पूर्णता का प्रतीक माने जाते हैं। इन 108 मोतियों का संबंध मुख्य रूप से पंच परमेष्ठी के गुणों से समझाया जाता है।
स्पष्टीकरण
जैन धर्म में पंच परमेष्ठी हैं:
- अरिहंत
- सिद्ध
- आचार्य
- उपाध्याय
- साधु
दिगंबर परंपरा में 108 संख्या को पंच परमेष्ठी के गुणों से जोड़ा जाता है:
- अरिहंत भगवान के 12 गुण
- सिद्ध भगवान के 8 गुण
- आचार्य परमेष्ठी के 36 गुण
- उपाध्याय परमेष्ठी के 25 गुण
- साधु परमेष्ठी के 27 गुण
इनका योग:
12 + 8 + 36 + 25 + 27 = 108
इसलिए जप-माला के 108 मोती हमें पंच परमेष्ठी के 108 गुणों की याद दिलाते हैं।
आध्यात्मिक समझ
जब साधक 108 मोतियों की माला से मंत्र-जप करता है, तो उसका उद्देश्य केवल गिनती पूरी करना नहीं होता, बल्कि अपने मन को पंच परमेष्ठी के गुणों की ओर लगाना होता है।
जैसे:
- अरिहंत से हमें वीतरागता की प्रेरणा मिलती है।
- सिद्ध से पूर्ण मुक्त अवस्था का स्मरण होता है।
- आचार्य से संयम और धर्म-नेतृत्व की प्रेरणा मिलती है।
- उपाध्याय से ज्ञान और अध्ययन का महत्व समझ आता है।
- साधु से त्याग, तप और आचरण की प्रेरणा मिलती है।
इस प्रकार 108 मोती साधक को यह याद दिलाते हैं कि आत्मा को भी इन महान गुणों की दिशा में आगे बढ़ना है।
Takeaway
दिगंबर जैन दृष्टि से जप-माला के 108 मोती पंच परमेष्ठी के 108 गुणों का प्रतीक हैं। माला फेरते समय साधक को केवल मंत्र की पुनरावृत्ति नहीं, बल्कि इन गुणों का चिंतन करना चाहिए, ताकि भाव शुद्ध हों और आत्मा मोक्षमार्ग की ओर अग्रसर हो।