णिव्वेगतियं भावड़ु मोहं चइऊण सब्ब दव्वेसु। जो तस्स हवेच्यागो इदि भणिदं जिणवरिदेहिं॥
Answer
इस गाथा का सरल अर्थ है:
सभी द्रव्यों के प्रति मोह को छोड़कर, निर्वेग/वैराग्य भाव धारण करना — यही सच्चा त्याग है। ऐसा जिनवर भगवानों ने कहा है।
Explanation
गाथा में मुख्य बात यह है कि त्याग केवल बाहरी वस्तुओं को छोड़ने का नाम नहीं है। वास्तविक त्याग तब होता है जब आत्मा के भीतर से मोह, आसक्ति और ममता कम होती है।
यहाँ:
- मोहं चइऊण — मोह को छोड़कर
- सब्ब दव्वेसु — सभी द्रव्यों में, अर्थात सभी बाहरी पदार्थों के प्रति
- च्यागो — त्याग
- जिणवरिदेहिं भणिदं — जिनवर भगवानों द्वारा कहा गया
जैन दर्शन के अनुसार पदार्थ अपने-अपने स्वभाव में रहते हैं, लेकिन जीव उनमें “मेरा” भाव करके बंधन में पड़ता है। इसलिए त्याग का मूल आधार भीतर का मोह-त्याग है।
Spiritual Understanding
जैन धर्म में त्याग का उच्चतम रूप आंतरिक त्याग है। यदि कोई व्यक्ति बाहरी वस्तु छोड़ दे, पर मन में उसके प्रति लालसा बनी रहे, तो वह पूर्ण त्याग नहीं माना जाता।
इसके विपरीत, जो व्यक्ति वस्तुओं के बीच रहते हुए भी उनमें ममता, राग और मोह नहीं रखता, वह त्याग की भावना की ओर बढ़ता है।
Takeaway
सच्चा त्याग वस्तु छोड़ने से पहले मोह छोड़ने में है। जिनवाणी हमें सिखाती है कि आत्मकल्याण के लिए बाहरी द्रव्यों से आसक्ति हटाकर आत्मा में स्थिर होना चाहिए।