तुषिणियो उवेहेजा न ताओ .मणसी करे
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Answer
“तुषिणियो उवेहेजा न ताओ मणसी करे” का सरल अर्थ है:
साधक को शांत और समभाव में रहना चाहिए; बाहरी बातों, कष्टों या परिस्थितियों को मन में पकड़कर चिंता, राग-द्वेष या अशांति नहीं करनी चाहिए।
Explanation
यह वाक्य जैन साधना की दृष्टि से उपेक्षा भाव और मन की शांति को दर्शाता है।
इसका भावार्थ है:
- तुषिणियो — शांत, मौन, स्थिर भाव से
- उवेहेजा — उपेक्षा करे, समभाव से देखे
- न ताओ मणसी करे — उन्हें मन में न बसाए, उनके कारण मानसिक विकार न करे
अर्थात, साधक को अनुकूल या प्रतिकूल परिस्थितियों में मन को विचलित नहीं करना चाहिए।
Spiritual Understanding
जैन धर्म में मोक्षमार्ग के लिए समता अत्यंत महत्वपूर्ण है। जब मनुष्य बाहरी घटनाओं को मन में पकड़ता है, तो राग, द्वेष, क्रोध, चिंता और मोह बढ़ते हैं। ये कर्म-बंध के कारण बनते हैं।
इसलिए ज्ञानी साधक:
- प्रशंसा में अहंकार नहीं करता,
- निंदा में दुखी नहीं होता,
- सुख-दुख में समभाव रखता है,
- और आत्मा की शुद्धि की ओर ध्यान देता है।
Takeaway
इस वाक्य का मुख्य संदेश है:
बाहरी परिस्थितियों को शांत भाव से सहन करो, उन्हें मन में स्थान देकर अशांति मत बढ़ाओ। समभाव ही जैन साधना की शक्ति है।