अवसॅपिणी काल कब तक चलेगा?
उत्तर
जैन धर्म के अनुसार वर्तमान में हम अवसर्पिणी काल में हैं। अवसर्पिणी काल कुल छह आरों में विभाजित होता है, और अभी पाँचवाँ आरा — दुःषमा काल चल रहा है।
परंपरागत जैन मान्यता के अनुसार पाँचवाँ आरा भगवान महावीर स्वामी के निर्वाण के बाद प्रारंभ हुआ और इसकी अवधि 21,000 वर्ष मानी जाती है। इसलिए अवसर्पिणी काल अभी समाप्त नहीं हुआ है; पाँचवें आरे के बाद छठा आरा आएगा।
व्याख्या
अवसर्पिणी काल के छह आरे हैं:
- सुषमा-सुषमा
- सुषमा
- सुषमा-दुःषमा
- दुःषमा-सुषमा
- दुःषमा
- दुःषमा-दुःषमा
अभी हम दुःषमा यानी पाँचवें आरे में हैं। इसके बाद दुःषमा-दुःषमा नाम का छठा आरा आएगा। छठा आरा पूरा होने के बाद अवसर्पिणी समाप्त होती है और फिर उत्सर्पिणी काल शुरू होता है।
आध्यात्मिक समझ
जैन दर्शन में कालचक्र अनादि-अनंत माना गया है। अवसर्पिणी में सुख, आयु, बल, नैतिकता और आध्यात्मिक क्षमता धीरे-धीरे घटती जाती है। इसलिए वर्तमान काल को धर्म साधना के लिए कठिन, लेकिन अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है।
निष्कर्ष
अवसर्पिणी काल अभी बहुत लंबा चलना बाकी है। अभी पाँचवाँ आरा चल रहा है, फिर छठा आरा आएगा, और उसके बाद ही अवसर्पिणी समाप्त होगी।