चौथे आरे की शुरूआत कब हुई
Answer
जैन धर्म के कालचक्र के अनुसार, चौथे आरे को दुःषमा-सुषमा आरा कहा जाता है। इसकी शुरुआत तीसरे आरे के समाप्त होने के बाद हुई थी।
परंपरागत जैन मान्यता के अनुसार, वर्तमान अवसर्पिणी काल में भगवान ऋषभदेव के समय से पहले चौथा आरा चल रहा था, और इसी चौथे आरे में 24 तीर्थंकरों का जन्म हुआ।
Explanation
जैन कालचक्र में अवसर्पिणी और उत्सर्पिणी, दोनों में 6-6 आरे होते हैं। वर्तमान में हम अवसर्पिणी काल में हैं।
अवसर्पिणी के 6 आरे हैं:
- पहला: सुषमा-सुषमा
- दूसरा: सुषमा
- तीसरा: सुषमा-दुःषमा
- चौथा: दुःषमा-सुषमा
- पाँचवाँ: दुःषमा
- छठा: दुःषमा-दुःषमा
चौथे आरे में सुख और दुःख दोनों का मिश्रण होता है, लेकिन धीरे-धीरे दुःख बढ़ने लगता है। इसी आरे में तीर्थंकर, चक्रवर्ती, बलदेव, वासुदेव आदि महापुरुष होते हैं।
Spiritual Understanding
चौथा आरा आध्यात्मिक दृष्टि से बहुत महत्वपूर्ण माना जाता है, क्योंकि इसी काल में तीर्थंकर भगवंत धर्मतीर्थ की स्थापना करते हैं और जीवों को मोक्षमार्ग बताते हैं।
Takeaway
संक्षेप में, चौथे आरे की शुरुआत तीसरे आरे के अंत के बाद हुई, और वर्तमान अवसर्पिणी में यही वह आरा है जिसमें 24 तीर्थंकर हुए।