हे त्रैलोक्यनाथ! 🙏🏻 आपके बताए हुए वीतरागी मार्ग पर निष्ठापूर्वक चलकर सर्वप्रथम मैं एक सच्चा, निष्ठावान और दृढ़ श्रावक बनूँ। सम्यग्दर्शन के पावन प्रभावना अंग को सार्थक करते हुए—अपने आदर्श आचरण, पुरुषार्थ, सम्यग्ज्ञान तथा आपकी पावन प्रदक्षिणा, भावपूर्ण वंदन
बहुत मंगल भाव हैं। नीचे आपके भावों को अधिक प्रार्थना-रूप, शुद्ध, प्रवाहपूर्ण और भक्तिपूर्ण हिंदी में सँवारा गया है:
प्रार्थना
हे त्रैलोक्यनाथ! हे वीतराग प्रभु!
आपके द्वारा बताए गए वीतराग मार्ग पर निष्ठापूर्वक चलते हुए, सर्वप्रथम मैं एक सच्चा, निष्ठावान, दृढ़ और जागरूक श्रावक बनूँ।
सम्यग्दर्शन के पावन प्रभावना-अंग को सार्थक करते हुए, अपने आदर्श आचरण, सत्पुरुषार्थ, सम्यग्ज्ञान, भावपूर्ण वंदन, पावन प्रदक्षिणा, मंगल आरती, जिन-पूजन और जिन-भक्ति के शुभ पुण्य-भावों के माध्यम से पवित्र जैन धर्म की श्रेष्ठ प्रभावना करूँ।
मेरे तन, मन, धन, समय, सामर्थ्य, ज्ञान तथा जीवन में प्राप्त प्रत्येक शुभ उपलब्धि और सफल पुरुषार्थ का सदुपयोग जिनधर्म की प्रभावना में हो।
जहाँ और जिस प्रकार मेरी सामर्थ्य हो, वहाँ मैं निःस्वार्थ भाव से जिनशासन की सेवा करूँ। पावन जैन धर्म, जिनशासन तथा समस्त जैन तीर्थों की मर्यादा, पवित्रता और गरिमा की रक्षा एवं संरक्षण के लिए धर्मानुकूल पुरुषार्थ करता रहूँ।
मेरे जीवन का प्रत्येक प्रयास जिनशासन की मंगल प्रभावना, धर्म की रक्षा और आत्मकल्याण की पवित्र भावना से प्रेरित हो।
सम्पूर्ण विश्व में “जैनं जयति शासनम्” की पावन विजय-ध्वजा फहराने का भाव मेरे अंतःकरण में जागृत रहे, और मैं जन-जन तक आपके वीतराग शासन तथा मोक्षमार्ग का मंगल संदेश पहुँचाने में निमित्त बनूँ।
हे प्रभु! मेरा प्रत्येक ऐसा पुरुषार्थ अहंकार, मान, यश, प्रशंसा अथवा लौकिक प्रतिष्ठा की इच्छा से रहित हो। वह केवल जिनशासन की प्रभावना और आत्मा के कल्याण की निर्मल भावना से प्रेरित हो।
तत्पश्चात्, आपके द्वारा प्रतिपादित मोक्षमार्ग पर आगे बढ़ते हुए, जब योग्य संयोग प्राप्त हों, तब मैं निर्ग्रंथ मुनि-दीक्षा अंगीकार करने योग्य बनूँ।
समस्त राग-द्वेष और कषायों का क्रमशः क्षय करते हुए, आत्मा के परम विशुद्ध, निर्मल और पूर्ण वीतराग भाव को प्राप्त करूँ।
और अंततः, समस्त आठ कर्मों से पूर्णतः मुक्त होकर, जन्म-मरण के संसार का अंत कर, शाश्वत सिद्ध पद को प्राप्त करूँ।
हे वीतराग प्रभु!
मेरी आत्मा में सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक् चारित्र की ऐसी निर्मल भावना जागृत हो कि मेरा प्रत्येक विचार, वचन और कर्म आपके बताए हुए मोक्षमार्ग के अनुकूल हो।
मेरा जीवन निरंतर आत्मकल्याण, जिनशासन की मंगल प्रभावना और वीतराग धर्म की पावन साधना की दिशा में अग्रसर होता रहे।
मंगल भावना
णमो अरिहंताणं। णमो सिद्धाणं। णमो आयरियाणं। णमो उवज्झायाणं। णमो लोए सव्वसाहूणं।
जैनं जयति शासनम्।