Arihanto ke char ganga tirth
जैन धर्म के अनुसार, "अरीहंत" वे जीव होते हैं जिन्होंने चारों "कषाय" (क्रोध, मान, माया, लोभ) का पूर्णतः नाश कर दिया है, और केवलज्ञान प्राप्त कर लिया है। "अरीहंतों के चार गंगा तीर्थ" का तात्पर्य चार महान गुणों या चार दिव्य प्रवृत्तियों से है, जिन्हें अरीहंत अपने भीतर धारण करते हैं। इन्हें "चार गंगा" या "चार तीर्थ" कहा जाता है। ये हैं:
- सम्यक् दर्शन (Right Faith)
- अरीहंत सम्यक् दर्शन के धारक होते हैं, अर्थात् वे वस्तु की यथार्थता को जान चुके होते हैं।
- सम्यक् ज्ञान (Right Knowledge)
- अरीहंत के पास भ्रमरहित, संपूर्ण और शुद्ध ज्ञान (केवलज्ञान) होता है।
- सम्यक् चारित्र (Right Conduct)
- वे संपूर्ण संयम और शुद्ध आचरण के धनी होते हैं।
- सम्यक् तप (Right Austerity)
- अरीहंत के भीतर तपस्या की पराकाष्ठा होती है, जिससे कर्मों का क्षय होता है।
इन चारों को 'चार गंगा तीर्थ' कहा जाता है क्योंकि अरीहंत इन्हीं चार गुणों के माध्यम से संसार को धर्म का मार्ग दिखाते हैं।
सारांश: अरीहंत के चार गंगा तीर्थ –
- सम्यक् दर्शन
- सम्यक् ज्ञान
- सम्यक् चारित्र
- सम्यक् तप