क्या इस नव-रचित पद की प्राकृत और व्याकरण सही हैं? धरणिंदं पम्मावइं, वंदामि पास-सासण-रक्खगे । उवसग्गे हरह मे, पासजिण-भत्तस्स देह अभयं ॥
Answer
आपका पद भाव की दृष्टि से सुंदर है, लेकिन प्राकृत और व्याकरण की दृष्टि से इसमें कुछ संशोधन आवश्यक हैं।
आपकी पंक्ति:
धरणिंदं पम्मावइं, वंदामि पास-सासण-रक्खगे । उवसग्गे हरह मे, पासजिण-भत्तस्स देह अभयं ॥
मुख्य समस्याएँ:
- धरणिंदं पम्मावइं — यदि दोनों देवताओं को वंदन करना है, तो द्विवचन/बहुवचन भाव स्पष्ट होना चाहिए।
- रक्खगे — “रक्षक” के लिए प्राकृत रूप सामान्यतः रक्खए / रक्खएहि आदि संदर्भानुसार आता है।
- उवसग्गे हरह मे — “मेरे उपसर्ग दूर करें” के लिए कर्म और संबोधन अधिक स्पष्ट होना चाहिए।
- देह अभयं — “अभय दो” के लिए देह रूप भाव में समझ आता है, पर छंद और संबोधन के अनुसार इसे व्यवस्थित करना बेहतर होगा।
एक अधिक स्वाभाविक संशोधित रूप
भाव को सुरक्षित रखते हुए इसे इस प्रकार कहा जा सकता है:
धरणिंद-पम्मावइए, वंदामि पास-सासण-रक्खए ।
मे उवसग्गे हरह, पासजिण-भत्तस्स देह अभयं ॥
Explanation
इसका सरल अर्थ होगा:
“मैं श्री पार्श्वनाथ प्रभु के शासन के रक्षक धरणेंद्र और पद्मावती को वंदन करता हूँ। हे देवों, पार्श्व जिनेन्द्र के भक्त के मेरे उपसर्ग दूर करें और मुझे अभय प्रदान करें।”
ध्यान देने योग्य बात यह है कि यह नव-रचित स्तुति-पद है, इसलिए इसे प्राचीन आगमिक गाथा जैसा प्रमाणित पाठ नहीं माना जाना चाहिए। इसे भाव-स्तुति के रूप में रखा जा सकता है।
Spiritual Understanding
जैन परंपरा में धरणेंद्र और पद्मावती को भगवान पार्श्वनाथ से संबंधित शासनदेव-शासनदेवी के रूप में श्रद्धा से स्मरण किया जाता है। परंतु साधना का मुख्य आश्रय हमेशा:
- अरिहंत,
- सिद्ध,
- आचार्य,
- उपाध्याय,
- साधु,
- और आत्मा की शुद्धि
में ही माना जाता है।
Takeaway
आपका पद भक्तिभाव से उचित है, पर प्राकृत-सौष्ठव के लिए इसे थोड़ा सुधारा जा सकता है। इसे प्रमाणित प्राचीन मंत्र या आगमिक गाथा न मानकर नव-रचित भक्तिपद के रूप में ही प्रयोग करना उचित होगा।