पंचामृताभिषेक मे बोली जानेवाली बृहत शांतीधारा का अर्थ
Answer
पंचामृताभिषेक में बोली जाने वाली बृहत् शांतिधारा का मुख्य अर्थ है — जिनेन्द्र भगवान के अभिषेक के माध्यम से आत्मा, समाज और समस्त जीवों के लिए शांति, मंगल, कल्याण और धर्म-वृद्धि की भावना करना।
यह केवल बाहरी जलधारा नहीं है, बल्कि शांति, पवित्रता, अहिंसा, क्षमा और आत्मकल्याण की भावना का प्रतीक है।
Explanation
बृहत् शांतिधारा में सामान्यतः निम्न भाव व्यक्त किए जाते हैं:
- अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और साधु परमेष्ठी को नमस्कार।
- जिनेन्द्र भगवान की महिमा का स्मरण।
- भगवान के अभिषेक द्वारा अपने अंदर के राग, द्वेष, क्रोध, मान, माया और लोभ को शांत करने की भावना।
- घर, परिवार, समाज और देश में शांति की कामना।
- सभी जीवों के प्रति मैत्री, करुणा और अहिंसा की भावना।
- धर्म, सम्यग्दर्शन, सम्यग्ज्ञान और सम्यक्चरित्र की वृद्धि की प्रार्थना।
पंचामृताभिषेक में दूध, दही, घी, शक्कर, जल आदि पवित्र द्रव्यों से भगवान का अभिषेक किया जाता है। इसके बाद शांतिधारा द्वारा मंगल और शांति की भावना की जाती है।
Spiritual Understanding
जैन धर्म में पूजा का उद्देश्य भगवान से सांसारिक वरदान मांगना नहीं है। भगवान तो वीतराग हैं — वे न राग करते हैं, न द्वेष, न किसी को पक्षपात से फल देते हैं।
इसलिए बृहत् शांतिधारा का सही आध्यात्मिक अर्थ है:
- भगवान की वीतरागता को देखकर अपने मन को शांत बनाना।
- अभिषेक की धारा के साथ अपने कर्म-मल को धोने की भावना करना।
- अपने जीवन में संयम, क्षमा, विनय और अहिंसा को बढ़ाना।
- संसार के सभी जीवों के कल्याण की भावना रखना।
धारा बाहर भगवान पर चढ़ती है, पर उसका भाव भीतर आत्मा को निर्मल करने का होता है।
Takeaway
बृहत् शांतिधारा का सार यह है:
“हे जिनेन्द्र प्रभु, आपकी वीतरागता का स्मरण करके हमारे भीतर की अशांति शांत हो, कर्मों की मलिनता घटे, धर्मभाव बढ़े और सभी जीवों में शांति व मंगल हो।”