Tyaag ka pachkhan
त्याग का पच्चखान (त्याग का निर्णय या व्रत) जैन धर्म में आत्म-संयम, त्याग और साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है। 'पच्चखान' शब्द का अर्थ है—किसी विशेष आचरण, व्रत या नियम को निश्चित समय तक के लिए ग्रहण करने या उसका संकल्प करना।
त्याग का पच्चखान आमतौर पर भोजन, वस्त्र, व्यवहार या अन्य भोग-विलास की वस्तुओं के त्याग के रूप में लिया जाता है। उदाहरण के लिए:
- रात्रि भोजन का त्याग (रात्रि में भोजन न करना)
- किसी विशेष वस्तु (जैसे - आलू, प्याज, लहसुन) का त्याग
- मिठाई, घी, तेल आदि का त्याग
- एक समय, दो समय, तीन समय भोजन का त्याग
- जल का त्याग (कुछ समय तक, विशेष संकल्प के अंतर्गत)
पच्चखान देने की विधि:
- श्रद्धा और संकल्प के साथ आचार्य, उपाध्याय या जिनवाणी के सामने पच्चखान बोला जाता है।
- उसमें यह स्पष्ट किया जाता है कि किस वस्तु या व्यवहार का त्याग, कितने समय के लिए और क्यों किया जा रहा है।
- पच्चखान प्रायः संस्कृत या प्राकृत में बोले जाते हैं, जैसे—
_"इच्छामि खमासमणो, में समणे भव्वइए, एयापण्णत्ते वत्ते, एत्तिकाले, एत्थाइं पदार्थाणं त्यागं पच्चखाणं समणो..."_ (मैं इतने समय के लिए, अमुक पदार्थ का त्याग करता हूँ…)
त्याग का पच्चखान लेने के लाभ:
- आत्मानुशासन व संयम की वृद्धि
- कर्मों का क्षय
- आध्यात्मिक उन्नति
- अहिंसा की भावना का विस्तार
त्याग का पच्चखान लेना जैन साधना का एक महत्वपूर्ण अंग है और गृहस्थ एवं साधु—दोनों के लिए उपयोगी है।