Okk par pathshala vale chapter ha bolte h ki raho sabke sath sbse vyavhaar bhi achha rakho lekin raho apne me hi kisi se rishte naate mat rakho
आपका प्रश्न जैन पाठशाला में सिखाई जाने वाली बातों के संदर्भ में है। जैन धर्म में व्यवहार, संबंध और आत्मनिर्भरता के विषय में स्पष्ट शिक्षाएँ दी गई हैं।
जैन धर्म का मूल सिद्धांत है – "जियो और जीने दो"। यह सिद्धांत हमें सिखाता है कि सभी प्राणियों के साथ प्रेम, करुणा और अहिंसा का व्यवहार रखें। व्यवहार में मधुरता, सत्यता और संयम महत्वपूर्ण माने गए हैं।
संबंधों के विषय में: जैन धर्म यह नहीं कहता कि किसी से रिश्ता मत रखो या खुद में ही रहो। बल्कि, यह सिखाता है कि संसारिक संबंधों में आसक्ति (attachment) न रखें, क्योंकि अत्यधिक मोह बंधन का कारण बनता है और मोक्ष मार्ग में बाधा डालता है।
व्यवहार के विषय में: जैन आचार्य और शास्त्र कहते हैं कि सभी के साथ मधुर, नम्र और अहिंसक व्यवहार करो। व्यवहार अच्छा रखना, सबका भला सोचना – यह जैन संस्कृति की पहचान है।
आत्मनिर्भरता: जैन साधु-साध्वियाँ संसार से पूर्णतः विरक्त रहते हैं, लेकिन गृहस्थ जैनियों के लिए कहा गया है कि वे परिवार, समाज के साथ रहकर भी – मोह और आसक्ति से मुक्त रहें।
निष्कर्ष:
- सबके साथ अच्छा व्यवहार करो, सभी की भलाई सोचो।
- संबंधों में फँसो नहीं, लेकिन सभी से प्रेमपूर्वक पेश आओ।
- संसारिक मोह से बचो, पर समाज में रहते हुए कर्तव्य निभाओ।
जैन आगम (उttaradhyayan सूत्र 6/16) में कहा गया है: "मित्रं च शत्रुं च समं करोति" अर्थात, मित्र और शत्रु दोनों के साथ समभाव (equanimity) रखना चाहिए।
सारांश: जैन धर्म यह सिखाता है कि सबके साथ अच्छा व्यवहार रखो, परन्तु अंदर से आसक्ति और अत्यधिक मोह मत रखो। यही सच्चा जैन दृष्टिकोण है।