Sadarmik bhakti ka kartavya
सदार्मिक भक्ति का कर्तव्य जैन धर्म में अत्यंत महत्वपूर्ण माना गया है। "सदार्मिक" का अर्थ है—जो हमारे ही धर्म और आचार का पालन करने वाले हैं, अर्थात् समान धर्म के अनुयायी। ऐसे सदार्मिक जनों के प्रति भक्ति, सेवा और सहानुभूति रखना जैन धर्म के कर्तव्यों में से एक है।
सदार्मिक भक्ति के मुख्य कर्तव्य:
- समान धर्मावलंबियों के प्रति आदरभाव:
सदार्मिकों का सम्मान करना, उनकी सेवा करना और उनके प्रति मैत्री भाव रखना।
- आर्थिक, शारीरिक, मानसिक सहायता:
यदि कोई सदार्मिक संकट में है, बीमार है या किसी परेशानी में है, तो उसकी सहायता करना।
- आहार-विहार की व्यवस्था:
मुनिराज, साधु-साध्वियों या गृहस्थ सदार्मिकों के लिए आहार, निवास आदि की व्यवस्था करना।
- धर्म चर्चा और साधन:
सदार्मिकों के साथ मिलकर धर्म चर्चा, स्वाध्याय, प्रवचन आदि में भाग लेना और धर्म का प्रचार-प्रसार करना।
- संसारिक दोषों से बचाना:
सदार्मिक को अधर्म, दुर्व्यसन, या दुष्कर्म से रोकना एवं सही मार्गदर्शन देना।
- मैत्री और सहिष्णुता:
सदार्मिकों के प्रति मैत्री, क्षमा और सहिष्णुता का भाव बनाए रखना।
जैन आगमों में कहा गया है— "सदार्मिक सेवा, सच्ची भक्ति और पुण्य का कार्य है। इससे आत्मा का शुद्धिकरण होता है और चारित्र की दृढ़ता बढ़ती है।"
इस प्रकार, सदार्मिक भक्ति न केवल एक सामाजिक कर्तव्य है, बल्कि यह आत्म कल्याण और पुण्य-संचय का भी साधन है।