बारह तप के नाम
जैन धर्म में "बारह तप" (१२ तप) का बहुत महत्त्व है। ये आत्मशुद्धि और मोक्ष की प्राप्ति के लिए किए जाते हैं। बारह तप दो भागों में बाँटे गए हैं: छह बाह्य तप और छह आंतर तप।
६ बाह्य तप (External Austerities):
- अणशन (Anashan) – उपवास करना (भोजन का त्याग)
- उनोदर (Unodari) – आवश्यकता से कम भोजन लेना
- वृत्तिसंक्षेप (Vritti-sankshep) – सीमित साधनों से भोजन करना
- रसपरित्याग (Rasa-parityag) – स्वादिष्ट या रुचिकर पदार्थों का त्याग
- कायक्लेश (Kayaklesha) – शरीर को कष्ट देना (जैसे कठिन साधना)
- संलीनता (Sanlinata/Pareshanleenta) – एकांत में रहना, इन्द्रियों का संयम
६ आंतर तप (Internal Austerities):
- प्रायश्चित्त (Prayaschitta) – प्रायश्चित्त या पश्चाताप करना
- विनय (Vinay) – विनम्रता और आदरभाव रखना
- वैयावृत्य (Veyavrutya/Vyayavritya) – गुरु, साधु आदि की सेवा करना
- स्वाध्याय (Swadhyaya) – धर्मग्रंथों का अध्ययन करना
- ध्यान (Dhyana) – ध्यान लगाना (एकाग्रता)
- कायोत्सर्ग (Kayotsarga) – शरीर से अलग आत्मा का अनुभव करना (शरीर की उपेक्षा)
ये बारह तप आत्मशुद्धि, पापों का क्षय और मोक्ष की दिशा में अग्रसर होने के लिए किए जाते हैं।