मैं सुखी में दुखी ऐसी मिथ्या कल्पना करने वाला जीव क्या कहलाता है
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जैन धर्म के अनुसार, जो जीव "सुखी में दुखी" अर्थात सच्चे सुख में भी दुख की मिथ्या (गलत) कल्पना करता है, वह "मिथ्यात्वी" कहलाता है। मिथ्यात्व का अर्थ है— सत्य को न पहचानना, सत्य को असत्य और असत्य को सत्य समझना। ऐसे जीव की दृष्टि भ्रमित होती है और वह सम्यक दर्शन (सही दृष्टिकोण) से दूर रहता है। मिथ्यात्व को जैन धर्म में बहुत बड़ा अवगुण माना गया है, क्योंकि यह आत्मा के बंधन, संसार में भटकाव और दुख का मुख्य कारण है।
सारांश: सुख में भी दुख की मिथ्या कल्पना करने वाला जीव "मिथ्यात्वी" कहलाता है।