Bahaya tapna krtla atichar che
Jainism अनुसार, "Bahya Tap" (बाह्य तप) यानी बाह्य तपस्या के दौरान किए जाने वाले "अतिचार" (अर्थात् उन नियमों का उल्लंघन) का वर्णन किया गया है। बाह्य तप के छह प्रकार हैं: अन्न-शक्ति, व्रत, उपवास, एकासन, रसल्प, विविक्त-शय्या। इनके पालन में जो अतिचार (गलतियाँ) होती हैं, उन्हें "बाह्य तप के अतिचार" कहते हैं।
बाह्य तप के सामान्य अतिचार:
- कालातीत: समय बीत जाने के बाद भी तपस्या का पालन करना।
- संकल्प: तपस्या करते समय मन में विभिन्न इच्छाएँ या संकल्प करना।
- अभिमान: तपस्या का अहंकार करना, दूसरों को दिखाना।
- संग्रह: तप के लिए विशेष भोजन या वस्तुओं का संग्रह करना।
- अन्याश्रय: तपस्या के लिए दूसरों पर निर्भर रहना।
- विघात: तपस्या में विघ्न डालना या दूसरों को डालना।
उदाहरण: यदि कोई उपवास कर रहा है, और भोजन न मिलने की चिंता से विशेष व्यवस्था करता है या बार-बार सोचता है कि अच्छा भोजन मिल जाए, तो यह अतिचार है। या, एकासन करते हुए भोजन का विशेष चुनाव करना, यह भी अतिचार है।
अर्थात्, बाह्य तप करते समय मन, वचन, काया से पूर्ण संयम और सरलता आवश्यक है। अतिचार से तपस्या की शुद्धि कम हो जाती है।
सारांश: बाह्य तप के अतिचार वे क्रियाएँ हैं जो तपस्या के समय नियमों का उल्लंघन करती हैं और तप की शुद्धता को नष्ट करती हैं। साधक को इनसे बचना चाहिए।