कौनसे भाव से गणधर नाम कर्म बंद होता है
जैन धर्म के अनुसार, "गणधर नाम कर्म" बंद होने का मुख्य कारण विशेष प्रकार के शुभ भाव (शुभ मनोभाव) होते हैं। जब जीव अत्यंत उच्च स्तर की साधना, ज्ञान, और संयम के साथ तीर्थंकर के समवसरण में उपस्थित रहकर उनके उपदेशों को समझने, ग्रहण करने, और प्रचार-प्रसार करने की तीव्र भावना रखता है, तब गणधर नाम कर्म का बन्ध होता है।
मुख्य भाव जो गणधर नाम कर्म के बन्ध का कारण बनते हैं:
- तीर्थंकर के प्रति अत्यंत श्रद्धा और भक्ति।
- अत्यंत उच्च ज्ञान-प्राप्ति की उत्कट इच्छा।
- धर्म के गूढ़ तत्वों को स्वयं जानने और दूसरों को समझाने की क्षमता एवं भावना।
- जीवों के कल्याण के लिए धर्म का प्रचार-प्रसार करने की भावना।
- सर्वज्ञ (केवलज्ञानी) के उपदेश को समझने व समझाने में रुचि और निपुणता।
- बहुत गहरे संयम, साधुता, और अहिंसा में स्थित रहना।
संक्षेप में: गणधर नाम कर्म का बन्ध विशेष रूप से तीर्थंकर के समवसरण में उनके उपदेश को सुनने, समझने, और धर्म के प्रचार-प्रसार की उच्च भावना (शुभ भाव) से होता है।
संदर्भ: तत्त्वार्थ सूत्र, गाथा 8.13 और जैनागम साहित्य।