सुपात्र दान यानी क्या
जैन धर्म में "सुपात्र दान" का अर्थ है—दान का ऐसा कार्य जिसमें दान (अर्थ, वस्त्र, अन्न, आदि) योग्य व्यक्ति को, अर्थात् सुपात्र को दिया जाए। "सुपात्र" वह है जो दान ग्रहण के योग्य है, जैसे कि जिनशासन के अनुसार आचार्य, उपाध्याय, साधु-साध्वी, या फिर सच्चे धर्माचरण में लगे हुए लोग।
जैन ग्रंथों के अनुसार, दान का फल (पुण्य) तभी श्रेष्ठ होता है जब वह सुपात्र को दिया जाए। यदि दान कुपात्र (अयोग्य व्यक्ति) को दिया जाता है, तो वह पुण्य का कारण नहीं बनता, बल्कि कभी-कभी पाप का कारण भी बन सकता है। इसलिए जैन धर्म में दान देने से पहले यह विचार करना आवश्यक है कि वह व्यक्ति या संस्था सुपात्र है या नहीं।
सुपात्र दान के मुख्य गुण—
- दान सुपात्र (धर्म का पालन करने वाले, संयमी, आचार्य आदि) को दिया जाए।
- दान शुद्ध भावना से दिया जाए।
- दान का उद्देश्य पुण्य अर्जन व जीवों की सहायता हो।
उदाहरण: किसी साधु-साध्वी को वस्त्र, भोजन, औषधि, आदि देना सुपात्र दान कहलाता है।