सबसे श्रेष्ठ सुपात्र या अभय दान?
जैन धर्म के अनुसार, दान (दान देना) एक महत्वपूर्ण धर्मकार्य है, और दान के अनेक प्रकार बताए गए हैं — जैसे अन्न दान, औषधि दान, शास्त्र दान, और अभय दान। इन सबमें "अभय दान" अर्थात् प्राणियों को भय से मुक्त करना, सबसे श्रेष्ठ माना गया है।
अभय दान का अर्थ है— सभी जीवों को हिंसा, डर, और कष्ट से बचाना, उन्हें सुरक्षा और अहिंसा का आश्वासन देना। जैन धर्म में अहिंसा सर्वोपरि है, इसलिए अभय दान को 'दानों का राजा' कहा गया है। यह दान न केवल मनुष्यों, बल्कि सभी प्राणियों के प्रति दिया जाता है। जब कोई जीव भय में हो, संकट में हो, तब उसकी रक्षा करना, उसे आश्रय देना, उसे न मारना, यही अभय दान है।
सुपात्र दान का अर्थ है— योग्य व्यक्ति को दान देना। जैन शास्त्रों के अनुसार, दान सुपात्र को ही देना चाहिए, अन्यथा उसका फल कम हो जाता है। लेकिन जब विभिन्न दानों की तुलना की जाती है, तो अभय दान सबसे श्रेष्ठ बताया गया है, क्योंकि यह सीधे जीव की रक्षा और अहिंसा से जुड़ा है।
निष्कर्ष: जैन धर्म के अनुसार, "अभय दान" सभी दानों में सबसे श्रेष्ठ (श्रेष्ठतम) है। संदर्भ: तत्त्वार्थ सूत्र (7.11), उत्तराध्ययन सूत्र (श्लोक 80-81)।