सात करोड़ सोना मोहर खर्च कर किसने शास्त्रग्रंथ लिखआए
जैन परंपरा के अनुसार, सात करोड़ सोना मोहर खर्च कर शास्त्रग्रंथों का लेखन करवाने का प्रमुख उदाहरण आचार्य पुष्पदंत और आचार्य भूतबली के समय का है। ऐसा कहा जाता है कि राजा श्रीधरसेन (कुछ ग्रंथों में वर्धमान) ने सप्तति करोड़ सुवर्ण मुद्राएँ (सात करोड़ सोना मोहर) खर्च करके "शतकंढागम" और "कसायपाहुड़" जैसे जैन आगम ग्रंथों का लेखन करवाया था।
यह कथानक विशेष रूप से दिगंबर जैन परंपरा में प्रसिद्ध है। राजा ने आचार्यों से अनुरोध किया कि वे श्रुत (ज्ञान) के संरक्षण हेतु ग्रंथों का लेखन करवाएँ, ताकि जैन धर्म का ज्ञान भावी पीढ़ियों तक सुरक्षित रहे। इसके लिए उन्होंने अपार धनराशि व्यय की, जिससे योग्य विद्वानों की सहायता से ग्रंथों की रचना और लिपिबद्धी संभव हो सकी।
सारांश: सात करोड़ सोना मोहर खर्च कर जैन शास्त्रग्रंथ लिखवाने का श्रेय राजा श्रीधरसेन को दिया जाता है।