नरक यात्रा करने वाली चकरी
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“नरक यात्रा करने वाली चकरी” का अर्थ (जैन दृष्टि)
- अर्थ: जैन आगम-ग्रंथों में नरक (नारकी) प्राणियों को दंड देने के अनेक ताड़न-यंत्र बताए गए हैं। “चकरी”/“चक्र-यंत्र” ऐसा घूमता हुआ धारदार लोहे का चक्र है जो नरक-रक्षकों द्वारा पापी जीव को बार‑बार काटता है। नरक देह क्षण-क्षण में पुनः बनती रहती है, इसलिए पीड़ा निरंतर बनी रहती है। यह सब बाहरी भगवान या दंडदाता की इच्छा से नहीं, अपने ही कष्टदायक कर्मों (हिंसा आदि) के उदय से होता है।
- किन कर्मों/कषायों से ऐसा परिणाम आता है:
- इससे बचाव का जैन उपाय:
- परम्परागत संकेत:
सार: “चकरी” नरक का एक दुःखद ताड़न‑यंत्र का रूपक/वर्णन है। उससे भय नहीं, सावधानी सीखें—अहिंसा, संयम, क्षमा और सतत प्रायश्चित्त ही नरक‑योनि और ऐसे यंत्रों से बचने का जैन मार्ग है।