महाराज साहब को पुत्र को भिक्षा में देना वो राय
संक्षिप्त, धर्मानुकूल राय:
- किसी “जीव” (जैसे पुत्र) को “भिक्षा” में देना जैन धर्म में मान्य नहीं है। भिक्षा का अर्थ मुनिराज के लिए अनुमत आहार या आवश्यक वस्तुएँ देना है, जीव नहीं। यह अहिंसा, अपरिग्रह और समता के विरुद्ध है।
- यदि पुत्र स्वयं दीक्षा लेना चाहे, तो वह “भिक्षा” नहीं, “दीक्षा” है। दीक्षा तभी उचित है जब:
- परम्परागत भेद:
निष्कर्ष: “पुत्र को भिक्षा में देना” जैन धर्म में अनुचित है। पुत्र यदि स्वयं सम्यक् प्रेरणा से दीक्षा चाहता हो, तो गुरु-शासन और परिवार की सहमति में, परम्परागत नियमों के अनुसार ही मार्ग अपनाएँ।