Jaina dharma me bitaraag ki abadharana
जैन धर्म में "वितराग" (वितरागता) की अवधारणा अत्यंत महत्वपूर्ण है। "वितराग" दो शब्दों से बना है—"वि" (अर्थात् रहित/परे) और "राग" (अर्थात् आसक्ति या मोह)। अतः वितराग का अर्थ है—राग, द्वेष, आसक्ति एवं मोह से पूर्णत: रहित होना।
वितरागता का तात्पर्य: जैन धर्म के अनुसार, जब कोई जीव अपने मन, वचन और काया से समस्त राग-द्वेष, मोह, क्रोध, मान, माया, लोभ आदि कषायों का नाश कर देता है, तब वह वितराग कहलाता है। वितरागता का चरम उदाहरण तीर्थंकरों में देखा जाता है, जिन्होंने संपूर्ण कषायों को जीत लिया है और वे किसी भी वस्तु, व्यक्ति या परिस्थिति से न तो आसक्त होते हैं और न ही द्वेष रखते हैं।
महत्त्व:
- जैन दर्शन में मोक्ष प्राप्ति का मार्ग वितरागता से होकर ही जाता है।
- केवल ज्ञान (संपूर्ण ज्ञान) की प्राप्ति भी वितराग अवस्था में ही संभव है।
- भगवान महावीर और अन्य तीर्थंकरों को "वितरागी देव" कहा जाता है।
आचरण में वितरागता:
- वितरागता केवल संन्यास या त्याग का नाम नहीं, बल्कि मन की वह अवस्था है जिसमें व्यक्ति समत्व भाव में स्थित रहता है।
- किसी भी वस्तु, संबंध या परिस्थिति से लगाव या विरोध न रखना।
- मित्र–शत्रु, सुख–दुःख, लाभ–हानि आदि द्वंद्वों के परे रहना।
सारांश: वितरागता जैन धर्म का मूल तत्व है। यही कारण है कि जैन पूजन में कहा जाता है—"वितरागाय नमः" अर्थात् उन अरिहंतों को नमन, जिन्होंने राग-द्वेष से परे होकर समत्व भाव को प्राप्त किया है।
संदर्भ:
- तत्त्वार्थ सूत्र (भगवान उमास्वामी)
- जैन आगम ग्रंथ
- जैन दर्शन के प्रमुख ग्रंथ
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