Arati parishah ke vijeta
आरति परिशह के विजेता
अर्थ
- आरति परिशह = धर्म-साधना, व्रत, तप, स्वाध्याय आदि के प्रति मन में ऊब, अरुचि या उद्वेग उठना।
- आरति परिशह का विजेता वह है जो ऐसी अरुचि उठने पर भी सम्यक्दर्शन–संयम नहीं छोड़ता, प्रसन्नचित्त रहकर नियम, तप और स्वाध्याय को निरन्तर निभाता है।
परम्परा-भेद
- दिगम्बर और श्वेताम्बर – दोनों परम्पराओं में “आरति” का भाव समान रूप से अरुचि/उदासी ही माना गया है और इसे 22 परिशहों में गिना जाता है (क्रम प्रायः 7वाँ)। उद्देश्य और साधना में कोई मूलभूत भेद नहीं बताया गया।
जीतने के पारम्परिक उपाय
- अनुप्रेक्षा/भावना-चिन्तन: अशरण, संसार, अनित्य, एकत्व आदि 12 भावनाओं का शांत भाव से मनन।
- नियम-बद्ध दिनचर्या: निश्चित समय पर स्वाध्याय, सामायिक/प्रतिक्रमण, वंदन, और तप का अभ्यास।
- गुरु-उपदेश और स्वाध्याय: आगम-पाठ, आचार्यों के उपदेश से दृढ़ता बढ़ाना।
- जप–ध्यान: नवकार मंत्र का जप, श्वास-संयम के साथ स्थिर ध्यान।
- कषाय-शमन: क्रोध, मान, माया, लोभ को पहचानकर क्षमा, विनय और साधु-प्रमोद से शांत करना।
- इन्द्रियनिग्रह व परिग्रह-संख्या: भोग–उपयोग सीमित रखना ताकि मन चंचल न हो।
- मैत्री व प्रमोद-भाव: सत्पुरुषों की प्रशंसा और धर्मकार्यों में रसानुभूति विकसित करना।
पहचान
- उदासी आती है, फिर भी टालना–बहाने नहीं; मन स्थिर, चेहरा प्रसन्न, कर्म निरन्तर। यही आरति परिशह-विजय का लक्षण है।
यदि आप कषाय-नोकषाय (जिनमें ‘रति–अरति’ का भी उल्लेख है) का संक्षेप देखना चाहें तो देखें: