Shwetambar chaityavandan jo mandir me kiya jaata he ki vidhi v uske samasta h mantra ke arth bataeye
नीचे “श्वेतांबर (मूर्तिपूजक) परंपरा” में मंदिर में किए जाने वाले Chaityavandan की सरल विधि और उसमें बोले जाने वाले प्रमुख सूत्र/मंत्रों का भावार्थ दिया है। अलग-अलग संघ/गच्छ (जैसे तपा/खर्तर्गच्छ) में क्रम या कुछ सूक्ष्म भिन्नताएँ हो सकती हैं, पर मूल भाव एक ही है।
A. तैयारी
- शुद्धता: स्वच्छ वस्त्र, मुखशुद्धि, शांत मन।
- सामग्री: पाट (आसन), मुखवास/जल, पूजा स्थान की मर्यादा का ध्यान।
- संकल्प: आज के Chaityavandan में सावधानीपूर्वक दरशन–वंदन कर आत्मशुद्धि करूँगा/करूँगी।
B. मंदिर में प्रवेश से पूर्ण होने तक – क्रम (संक्षेप) 1) प्रथम निष्सिहि (Nissihi) अर्थ: “मैं बाह्य विषय–विकारों का त्याग कर, जिनालय में शुद्ध भाव से प्रविष्ट होता/होती हूँ।” उपयोग: मंदिर की देहली/मंडप में प्रवेश करते समय।
2) जिनप्रतिमा/वितान के निकट जाना, श्रद्धा से दर्शन - नेत्रों में प्रतिमा का शांत दर्शन, राग–द्वेष का त्याग, भीतर नम्रता।
3) द्वितीय निष्सिहि (Nissihi) अर्थ: “अब मैं केवल जिनेन्द्र–आराधना के कार्य में लगूँगा/लगूँगी; अन्य विचार त्यागता/त्यागती हूँ।” उपयोग: आसन/स्थान ग्रहण करते समय।
4) पंचांग प्रणाम/वंदना भाव: अहंकार का क्षय, पंच परमेष्ठी के प्रति पूर्ण समर्पण।
5) नमोकार महामंत्र (Navkār Mantra) मूल भावार्थ: - अरिहंत, सिद्ध, आचार्य, उपाध्याय और समस्त साधु—इन पंच परमेष्ठियों को नमस्कार। - फल: पापक्षय, शांति और सम्यक् मार्ग की प्रेरणा।
6) इरियावहियए (Iriyāvahiyae) – गतिच्युत्ति प्रायश्चित्त भावार्थ: “मंदिर आते-जाते अनजाने में हुए सूक्ष्म जीव–हिंसा हेतु क्षमा चाहता/चाहती हूँ; देह की गति में सावधानी रखूँगा/रखूँगी।”
7) अलोचना/क्षमापना (Tass’uttari karanam का भाव) भावार्थ: “पूर्व में हुए अनुचित कर्मों–भूलों का स्वीकार करता/करती हूँ; पुनरावृत्ति न करने का निश्चय है; सभी जीवों से क्षमा चाहता/चाहती हूँ—मिच्छामि दुक्कडम्।”
8) कायोत्सर्ग (Kayotsarga) भावार्थ: “देह–विकारों से अलग होकर आत्मा के स्वरूप में स्थित होना, स्थिरता व साक्षीभाव; राग–द्वेष का क्षय।”
9) चतुर्विंशतिस्तव/नमुत्थुणं (Chauvīsaththaya / Namutthunam) भावार्थ: “चौबीस तीर्थंकरों की स्तुति; उनके ज्ञान, दर्शन और चारित्र से प्रेरणा लेकर वैसा ही पवित्र आचरण करने का संकल्प।”
10) गुरु–वंदन (Vandan) भावार्थ: “जिनशासन के आचार्य–उपाध्याय–साधु भगवंतों के प्रति श्रद्धा, आज्ञा–पालन और विनय का अभ्यास।”
11) प्रत्याख्यान/अनुस्थान संकल्प (Pratyākhyān) भावार्थ: “एक निश्चित समय तक कुछ दोषों/असंयमों का त्याग करूँगा/करूँगी (जैसे असावधानी, व्यर्थ वचन, आदि); संयम–सावधानी बढ़ाने का व्रत।”
12) तृतीय निष्सिहि (Nissihi) भावार्थ: “अब इस आराधना को यथायोग्य पूर्ण करके, शेष सांसारिक कार्यों में लगूँगा/लगूँगी—परंतु सावधानी व धर्म–स्मृति बनाए रखूँगा/रखूँगी।”
C. प्रमुख मंत्र/सूत्रों के सरल अर्थ (श्वेतांबर भावानुसार)
- Nissihi: विषय–विकारों का निषेध; अभी के क्षण में केवल आराधना।
- Navkār Mantra: पंच परमेष्ठी को नमस्कार; उनके गुणों का स्मरण ही मोक्ष–मार्ग का मूल है।
- Iriyāvahiyāe: चलने–फिरने में हुई सूक्ष्म हिंसा का प्रायश्चित्त, आगे अधिक सावधानी का निश्चय।
- Alochanā–Pratikraman (Tass’uttari karanam का भाव): अपनी भूलों को पहचानना, स्वीकारना, क्षमा माँगना और न दोहराने का व्रत।
- Kayotsarga: देह–अहंकार से अलग आत्मस्वरूप में स्थित होना; क्षमा, मैत्री, समत्व का भाव।
- Chauvīsaththaya / Namutthunam: 24 तीर्थंकरों की महिमा–स्तुति; उनसे सम्यग्दर्शन–ज्ञान–चारित्र की प्रेरणा।
- Vandan (Guru Vandana): जिनशासन के साधु–समुदाय के प्रति विनय–श्रद्धा; उनकी आज्ञा ही धर्म का पथप्रदर्शक।
- Pratyākhyān: निश्चित अवधि तक किसी दोष/असयम का त्याग—जैसे असावधानी, रात्रि–भोजन, कषाय में वृद्धि—इत्यादि; आत्मशुद्धि का संकल्प।
- Michchhāmi Dukkaḍaṃ (भाव): “यदि मुझसे किसी को पीड़ा पहुँची हो तो क्षमा करें; मैं भी सबको क्षमा करता/करती हूँ।”
व्यावहारिक संकेत
- मन्त्रों का उच्चारण परंपरागत प्राकृत/संस्कृत उच्चारण से करें।
- हर चरण में मन का केंद्र “समता–क्षमाभाव–अहिंसा” पर रहे; दिखावे/गणना पर नहीं, भाव पर ध्यान दें।
- यदि आपके गच्छ/संघ में क्रम थोड़ा भिन्न हो, तो अपने परिवार–समुदाय की परंपरा का सम्मान रखें—अर्थ और भाव वही रहें।
टिप्पणी (परंपरा भेद)
- यह विधि श्वेतांबर मूर्तिपूजक परंपरा के अनुसार है। स्थानकवासी–तेरापंथ में मंदिर–आधारित Chaityavandan का स्वरूप नहीं होता; वे अवश्यकों का अभ्यास बिना मूर्ति–दर्शन के करते हैं। मूल भावार्थ समान—अहिंसा, क्षमा, सम्यक्त्व—रहते हैं।
यदि आपको इन्हीं चरणों का एक-पृष्ठ “दैनिक उपयोग” हेतु संक्षिप्त प्रिंटयोग्य रूप चाहिए, बताइए—मैं बिना अतिरिक्त व्याख्या के क्रमवार पाठ्य सूची तैयार कर दूँगा/दूँगी।