Bhaade ka karm kiya ho arthaat
लगता है आप “भाड़े का कर्म” लिख रहे हैं, पर Jain darshan में शुद्ध शब्द “Bandha (Karma‑bandh)” है. Arthaat — कर्मों का आत्मा से बंध जाना.
Saar (बहुत सरल):
- Asrava = मन‑वचन‑काया की गतिविधि से कर्म‑कण आत्मा के पास आते हैं.
- Bandha = कषायों (क्रोध, मान, माया, लोभ) के साथ वे कर्म आत्मा से सचमुच “बंध” जाते हैं.
- यही बंधन जन्म‑मरण (संसार) चलाता है. निरोध (Samvara) और क्षय (Nirjara) से बंधन मिटता है, तभी मोक्ष.
Bandha के चार भेद (Tattvarth‑सूत्र परंपरा): 1) Prakriti‑bandh – कौन‑सा कर्म बंधा (ज्ञानावरण, दर्शनावरण, मोहनीय, अन्तराय, वेदनीय, नाम, आयु, गोत्र)। 2) Sthiti‑bandh – कितनी अवधि तक रहेगा। 3) Anubhāga (Intensitiy) – उसका बल कितना होगा। 4) Pradeśa‑bandh – कितने कर्म‑कण बंधे।
Bandha के मुख्य कारण:
- मिथ्यात्व (गलत श्रद्धा), अविरति, प्रमाद, कषाय — और इनसे युक्त योग (मन‑वचन‑काया की चेष्टा)।
Digambar–Shvetambar दृष्टि:
- दोनों परंपराएँ Bandha को समान रूप से मानती हैं. अंतर केवल Nav‑tattva की गिनती में है: श्वेतांबर 9 तत्त्व (पुण्य‑पाप अलग), दिगंबर 7 तत्त्व मानते हैं (पुण्य‑पाप आस्रव/बंध में समाहित), पर सिद्धान्त एक ही है.
उपयोगी भेद:
- Dravya‑karm = जो सूक्ष्म द्रव्य रूप कर्म कण बंधते हैं.
- Bhāva‑bandh = भीतर का भाव (कषाय/उद्देश्य) जो बंधन को जन्म देता है. सही भाव से बंधन रुकता है.
छोटा उदाहरण:
- क्रोध में कठोर वचन कह दिए → आस्रव + कषाय के कारण वही वचन कर्म‑बंध बन जाता है; प्रायश्चित्त, क्षमा, संयम से वही बंध शिथिल/क्षीण होता है.
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