आचार्य श्री भद्रबाहु स्वामी
आचार्य श्री भद्रबाहु स्वामी जैन धर्म के महान आचार्यों में से एक माने जाते हैं। वे लगभग 4वीं शताब्दी ईसा पूर्व के समय के मुनि थे। भद्रबाहु स्वामी को अंतिम श्रुत केवली (अर्थात् अंतिम आचार्य जिनके पास संपूर्ण श्रुतज्ञान था) माना जाता है। वे चंद्रगुप्त मौर्य के समकालीन थे।
भद्रबाहु स्वामी का नाम विशेष रूप से जैन इतिहास में इसलिए प्रसिद्ध है क्योंकि उनके निर्देशन में दक्षिण भारत (श्रवणबेलगोला) की ओर जैन संघ का प्रवास हुआ। ऐसा कहा जाता है कि जब मगध प्रदेश में भयंकर अकाल पड़ा, तब भद्रबाहु स्वामी के नेतृत्व में कई जैन मुनि दक्षिण भारत चले गए। वहां उन्होंने कठोर साधना की और चंद्रगुप्त मौर्य ने भी उनके साथ दीक्षा लेकर श्रवणबेलगोला में साधना की थी।
भद्रबाहु स्वामी के समय ही जैन संघ दो प्रमुख शाखाओं — श्वेताम्बर और दिगम्बर — में विभाजित हुआ, हालांकि यह विभाजन पूर्ण रूप से बाद में स्पष्ट हुआ।
उनका जीवन त्याग, साधना, और ज्ञान का प्रतीक माना जाता है, और जैन इतिहास में उनका अत्यंत महत्वपूर्ण स्थान है।