Halardu k 2gatha mai prabhuji ka ek visheshan bataye
Halardu की 2वीं गाँथा में प्रभु का एक सामान्य विशेषण: “वीतराग”.
अर्थ (जैन परंपरा के अनुसार):
- वीतराग = जो राग-द्वेष से पूर्णत: रहित हों; जिनका चित्त समता में स्थित हो।
- यह विशेषण दोनों ही परंपराओं (दिगंबर और श्वेतांबर) में समान भाव से स्वीकार है—अर्थात् प्रभु कर्म-उद्रेक, आसक्ति और द्वेष से परे हैं, केवल आत्म-स्वरूप में स्थित।
आध्यात्मिक भाव:
- “वीतराग” स्मरण कर भक्ति करने से साधक भी राग-द्वेष क्षीण कर समता, क्षमा और अहिंसा को साधता है, जो मोक्षमार्ग का मूल है।